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BHU में कभी सम्मान में मिलती थी मुफ्त विधिक सलाह, अब एक पेशी के पांच लाख

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काशी हिंदू विश्वविद्यालय



जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के लीगल सेल के इतिहास और वर्तमान कार्यप्रणाली के बीच बड़ी खाई नजर आने लगी है। एक समय में जहां देश के दिग्गज वकील अपनी सेवाओं को महामना की बगिया के लिए सम्मान मानते थे, वहीं आज विश्वविद्यालय का खजाना निजी वकीलों की भारी-भरकम फीस भरने में खाली हो रहा है।

विश्वविद्यालय के पुराने दिनों को याद करते हुए विधि संकाय के वरिष्ठों का कहना है कि पूर्व कुलपति प्रो. पंजाब सिंह के कार्यकाल तक लीगल सेल की साख बुलंद थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता वीके उपाध्याय विधिक सलाहकार के रूप में विश्वविद्यालय को निश्शुल्क सेवाएं देते थे। विधिक सलाह के लिए फाइलें उनके पास जाती थीं, लेकिन वे परामर्श का कोई शुल्क नहीं लेते थे।

मुकदमों में उपस्थित होने पर वे केवल सरकारी रेट (10 से 12 हजार रुपये प्रति हीयरिंग) पर ही फीस लेते थे। वे कभी किसी पक्ष या विपक्ष के दबाव में नहीं आए और अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। उनका सम्मान जस्टिस गिरधर मालवीय जैसे दिग्गज भी करते थे। इसी परंपरा को वाराणसी के प्रख्यात वकील मोती लाल खत्री ने भी आगे बढ़ाया, जिन्होंने करीब तीन दशकों तक बीएचयू को अपनी सेवाएं दीं।

वर्ष 2020 में पुराने अनुभवी सलाहकारों को हटाए जाने के बाद लीगल सेल की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव आया। ला फैकल्टी से सेवानिवृत्त हुए अली मेहंदी को लीगल एडवाइजर बनाया गया और उन्हें 2.5 लाख मासिक का भारी-भरकम भुगतान शुरू हुआ।

आरोप है कि पिछले तीन वर्षों में मुकदमों की निगरानी के नाम पर निजी अधिवक्ताओं के चयन और उनके भुगतान का पैमाना (पांच लाख रुपये प्रति पेशी तक) तय करने में इनकी मुख्य भूमिका रही। इसी दौर में बीएचयू के विधिक बजट में करोड़ों का उछाल आया, लेकिन कानूनी मोर्चे पर विवि को लगातार हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, वर्तमान कुलपति ने अली मेहंदी की कार्यवधि को विस्तार नहीं दिया, जिसके बाद वर्तमान में लीगल एडवाइजर का पद खाली है।

काबिलेगौर है कि जब बीएचयू के पास निश्शुल्क विधिक सलाह देने वाले और सरकारी दरों पर लड़ने वाले दिग्गज वकील थे, तब कोई सवाल नहीं उठा। आज करोड़ों खर्च करने के बाद भी विवि की साख अदालतों में दांव पर लगी है। विश्वविद्यालय अब इस दोराहे पर खड़ा है कि क्या वह पुनः वीके उपाध्याय और मोती लाल खत्री जैसे सेवाभावी विशेषज्ञों के युग की ओर लौटेगा या निजी वकीलों के महंगे तंत्र में ही फंसा रहेगा।

मुकदमों में भारी खर्च के बाद भी परिणाम \“शून्य\“, विधिक रणनीति पर सवाल
करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद मुकदमों के परिणाम विश्वविद्यालय के पक्ष में न आना प्रशासन की विधिक रणनीति पर सवाल खड़ा कर रहा है। हाल ही में नियुक्तियों और प्रमोशन के मामलों में हाई कोर्ट से मिले झटकों ने इस संदेह को और गहरा कर दिया है।

शिक्षकों का विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरोप है कि सरकारी अधिवक्ताओं की उपलब्धता के बावजूद, निजी वकीलों को पैरवी के लिए करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया है। विवि के बजट का बड़ा हिस्सा कानूनी लड़ाई में खर्च होने पर अब शिक्षक संघ और छात्र संगठनों ने तीखी आपत्ति जताई है।

विवि के सरकारी अधिवक्ता को हाई कोर्ट में प्रति सुनवाई 10 से 12 हजार रुपये भुगतान किया जाता है, लेकिन विशेष मामलों की निगरानी के नाम पर पांच लाख से अधिक भुगतान किया गया। निजी वकीलों को प्रतिवर्ष 2.5 करोड़ से अधिक की राशि दी गई है। जब न्यूनतम शुल्क पर अनुभवी सरकारी वकील उपलब्ध थे तो निजी वकीलों पर करोड़ों खर्च करने का तार्किक आधार स्पष्ट नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट में जाने की तैयारी में विवि प्रशासन
हाई कोर्ट के फैसले के बाद विवि प्रशासन में चर्चाएं चरम पर रहीं। विवि को उन सभी समितियों की समीक्षा करनी होगी जो ईसी की अनुपस्थिति में बनी थीं। अब चयन समितियों में केवल \“संबंधित विषय\“ के विशेषज्ञों को रखना अनिवार्य होगा जबकि जेनेरिक विशेषज्ञों का दौर खत्म होगा।

इस विवाद के बाद यूजीसी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में \“आपात शक्तियों\“ के उपयोग पर नए दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। यह भी संभावना है कि बीएचयू प्रशासन इस कानूनी उलझन से बचने के लिए शीर्ष अदालत की शरण ले, इसकी तैयारी चल रही।
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