मंत्री संजय कुमार। फाइल फोटो
राज्य ब्यूरो, पटना। सरकार ने स्वीकार किया है कि राज्य के कई हिस्से के पेयजल में नाइट्रेट और लेड की मात्रा खतरनाक स्तर पर है। लाेक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग यंत्रों के जरिए इनका उपचार कर रहा है।
विभागीय मंत्री संजय कुमार सिंह ने बुधवार को जदयू के दुलाल चंद्र गोस्वामी सहित अन्य सदस्यों के ध्यानाकर्षण के उत्तर में यह जानकारी दी। गोस्वामी का कहना था कि सीमांचल में दूषित पेयजल के कारण कैंसर की बीमारी पढ़ रही है।
नल-जल योजना का पानी इतना दूषित है कि लोग इसके बदले चापाकल का पानी पी रहे हैं। मंत्री ने कहा कि अत्यधिक दोहन के कारण भूजल की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। 14 जिलों के पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है।
कुल 4709 वार्डों में आर्सेनिक की अधिक मात्रा पाई गई है। आर्सेनिक के अलावा आयरन और फ्लोराइड को नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। नाइट्रेट के लिए चिन्हित चापकलों पर लाल निशान लगा दिया गया है।
उन्होंने बताया कि पेयजल से जुड़ी एक लाख 11 हजार शिकायतों में से एक लाख आठ हजार का निदान कर दिया गया है। आर्सेनिक, आयरन और फ्लोराइड शोधन यंत्र लगाए गए हैं। पेयजल की नियमित जांच हो रही है। भूजल के दूषित होने के बाद राज्य सरकार पेयजल के रूप में सतही जल के उपयोग को बढ़ावा दे रही है।
आउसटसोर्सिंग कर्मियों का शोषण
श्रम संसाधन एवं प्रवासी श्रमिक कल्याण मंत्री संजय सिंह टाइगर ने इंडियन इंक्लूसिव पार्टी के विधायक इंद्रजीत प्रसाद गुप्ता को बताया कि सरकार आउट सोर्सिंग के माध्यम से काम कर रहे श्रमिकों के हितों का संरक्षण कर रही है।
उन्हें नियमित तौर पर साप्ताहिक अवकाश दिया जा रहा है। साप्ताहिक अवकाश के दिन काम करने के एवज में दोगुनी मजदूरी दी जा रही है। गुप्ता का कहना था कि राज्य सरकार आउट सोर्सिंग एजेंसियों से राज्य के स्तर पर करार करती है। जिला स्तर पर करार हो तो श्रमिकों को अधिक सुविधा होगी।
टाइगर ने गुप्ता के एक अन्य प्रश्न के जवाब में कहा कि बीड़ी श्रमिकों का पंजीयन केंद्र सरकार के ई पोर्टल पर होता है। राज्य में उनके पंजीयन की कोई व्यवस्था नहीं है। मंत्री ने बीड़ी मजदूरों को परिचय पत्र देने की मांग पर विचार का आश्वासन दिया।
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