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सासामुसा चीनी मिल: बंद गेट से फिर जगी उम्मीद, उत्तर बिहार की अर्थव्यवस्था को मिल सकता है नया सहारा

deltin33 5 hour(s) ago views 686
  

सासामुसा चीनी मिल



जागरण संवाददाता, गोपालगंज। गोपालगंज के खेम मटिहनिया गांव के गन्ना किसान ज्ञानचंद प्रसाद कुशवाहा के चेहरे पर लंबे समय बाद उम्मीद दिख रही है। कारण है—राज्य सरकार द्वारा सासामुसा चीनी मिल को पुनर्जीवित करने की पहल।

ज्ञानचंद कहते हैं कि यदि मिल दोबारा चालू होती है तो किसानों को गन्ना बेचने दूर नहीं जाना पड़ेगा। समय पर खरीद होगी और लागत का दबाव कम होगा। उनके जैसे सैकड़ों किसानों में नई ऊर्जा का संचार हुआ है।
बंदी से टूटी थी खेती की रफ्तार

गन्ना किसान रीतिक मल प्रसाद और उदय कुशवाहा बताते हैं कि मिल बंद होने के बाद गन्ने की खेती पर सीधा असर पड़ा। पहले बड़े पैमाने पर खेती होती थी, लेकिन खरीद की अनिश्चितता ने रकबा घटा दिया।

मिल चालू रहने पर नियमित भुगतान और स्थिर बाजार मिलता था। बंदी के बाद किसानों को दूसरे जिलों में भटकना पड़ा, जिससे लागत बढ़ी और मुनाफा घटा।
नौ दशक पुराना गौरव

करीब 1935 में स्थापित सासामुसा चीनी मिल कभी उत्तर बिहार की आर्थिक धड़कन मानी जाती थी। कुचायकोट, उचकागांव, पंचदेवरी और कटेया जैसे प्रखंडों की आजीविका इससे जुड़ी रही।

गन्ना नकदी फसल बना और हजारों परिवारों के चूल्हे इसी मिल से जलते थे। पिछले पांच वर्षों से बंद पड़ी यह मिल अब पुनः सुर्खियों में है।
सरकार की पहल और ठोस संकेत

पटना में आयोजित गन्ना किसान संगोष्ठी में गन्ना उद्योग मंत्री संजय कुमार ने स्पष्ट कहा कि सरकार मिल के पुनः संचालन के लिए प्रतिबद्ध है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति लगातार प्रयास कर रही है।

अपर मुख्य सचिव के. सेंथिल कुमार ने बिहार के \“खोए चीनी गौरव\“ को वापस लाने की बात कही। विभागीय अधिकारियों का मानना है कि मिल खुलने से स्थानीय अर्थव्यवस्था में फिर रौनक लौटेगी।
निरानी ग्रुप से बातचीत

कर्नाटक की निरानी ग्रुप के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संभावित संचालन पर चर्चा हुई है। इस संवाद के बाद किसानों और मजदूरों में सकारात्मक माहौल बना है।

यदि समझौता आगे बढ़ता है, तो आधुनिक तकनीक के साथ मिल का संचालन संभव हो सकता है, जिससे उत्पादन और रोजगार दोनों बढ़ेंगे।
सिर्फ मिल नहीं, उम्मीद की धुरी

सासामुसा चीनी मिल का पुनः संचालन केवल एक औद्योगिक इकाई को चालू करना नहीं होगा, बल्कि यह क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को फिर गति देने जैसा होगा।

ज्ञानचंद जैसे किसानों का कहना है कि अगर मिल फिर से चली, तो यह मशीनों का शोर नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की जिंदगी में लौटती रौनक की आवाज होगी। उत्तर बिहार की यह पुरानी धुरी एक बार फिर उम्मीद का केंद्र बन सकती है।
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