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Hindu Marriage: सात फेरे ही क्यों? जानें क्यों इन 7 कदमों के बिना अधूरा है शादी का बंधन

Chikheang 2026-1-1 13:56:05 views 977
  

क्यों फेरों के बिना अधूरी है हर शादी? (Image Source: Freepik)



धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं का एक पवित्र बंधन माना गया है। इस संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा है \“सप्तपदी\“ यानी सात फेरे। अग्नि को साक्षी मानकर लिए गए ये सात फेरे ही वर-वधू को पति-पत्नी के रूप में धर्म और समाज की मान्यता दिलाते हैं। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि फेरे \“सात\“ ही क्यों होते हैं? इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक रहस्य छिपे हैं, जो दांपत्य जीवन को सात जन्मों के अटूट बंधन में बांधते हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
सात की संख्या का रहस्य

भारतीय संस्कृति में \“7\“ के अंक को पूर्णता का प्रतीक माना गया है। संगीत के सात सुर, इंद्रधनुष के सात रंग, सप्ताह के सात दिन, सात समुद्र, सात ऋषि (सप्तर्षि) और शरीर के सात ऊर्जा चक्र- ये सभी प्रकृति के संतुलन को दर्शाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, जब वर-वधू अग्नि के चारों ओर सात कदम चलते हैं, तो वे ब्रह्मांड की इन सात शक्तियों के साथ तालमेल बिठाते हैं। मान्यता है कि सात कदम साथ चलने से अजनबियों के बीच भी मित्रता (मैत्री) स्थापित हो जाती है।
सप्तपदी के 7 पग और उनका अर्थ:

हर फेरा एक विशेष संकल्प और जिम्मेदारी को दर्शाता है:

पहला फेरा: जीवन में भोजन और संसाधनों की व्यवस्था के लिए।

दूसरा फेरा: शारीरिक और मानसिक शक्ति तथा स्वास्थ्य के लिए।

तीसरा फेरा: धन-धान्य और आर्थिक समृद्धि के लिए।

चौथा फेरा: आत्मिक सुख, ज्ञान और प्रेम की वृद्धि के लिए।

पांचवां फेरा: संतान सुख और उत्तम परिवार की कामना के लिए।

छठा फेरा: सभी ऋतुओं में साथ रहने और दीर्घायु के लिए।

सातवां फेरा: आजीवन मित्रता और धर्म के मार्ग पर साथ चलने के लिए।
क्यों है यह जरूरी?

शास्त्रों के अनुसार, बिना सप्तपदी के विवाह को कानूनी या धार्मिक रूप से पूर्ण नहीं माना जाता। ये सात फेरे पति-पत्नी के बीच उस विश्वास की नींव रखते हैं। जिससे वे सुख-दुख में एक-दूसरे का संबल बनते हैं। अग्नि, जो शुद्धता का प्रतीक है, उसके फेरे लेने का अर्थ है कि दोनों अपने वचनों को पवित्रता के साथ निभाएंगे।
सात फेरे केवल एक रस्म नहीं

हिंदू विवाह के ये सात फेरे केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सुखी जीवन का \“रोडमैप\“ हैं। यह हमें सिखाता है कि गृहस्थ जीवन की सफलता आपसी तालमेल, समर्पण और कर्तव्यों के निर्वहन में है। यही कारण है कि सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी भारतीय शादियों की आत्मा बनी हुई है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
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