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SGPC कर्मचारियों के हक में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, रिटायरमेंट लाभ को लेकर दिया बड़ा आदेश

Chikheang 2025-12-19 02:36:43 views 1137
  

SGPC कर्मचारियों के हक में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला। सांकेतिक फोटो



राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा है कि बिना विधिसम्मत विभागीय कार्रवाई के उनके रिटायरमेंट लाभ रोके नहीं जा सकते।

अदालत ने एसजीपीसी की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि उसके कर्मचारियों से जुड़े सेवा विवादों पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ ने कई याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाते हुए कहा कि एसजीपीसी एक वैधानिक संस्था है और उसके द्वारा बनाए गए सेवा नियम भी वैधानिक स्वरूप रखते हैं। ऐसे में इन नियमों के उल्लंघन की स्थिति में हाईकोर्ट को क्षेत्राधिकार के प्रयोग से रोका नहीं जा सकता। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे एसजीपीसी में दशकों तक सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उन पर कथित अनियमितताओं के आरोप लगाकर उनकी ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और प्रोविडेंट फंड जैसी वैधानिक देनदारियां रोक ली गईं।

कर्मचारियों ने दलील दी कि न तो उन्हें कभी चार्जशीट दी गई और न ही सेवा नियमों के अनुसार कोई नियमित विभागीय जांच कराई गई। इसके बावजूद उनके जीवनभर की कमाई को रोके रखा गया।

एसजीपीसी की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि भले ही एसजीपीसी एक वैधानिक निकाय हो, लेकिन उसके सेवा नियम किसी विधायी अधिनियम से सीधे तौर पर नहीं बने हैं, इसलिए कर्मचारी-नियोक्ता का संबंध निजी प्रकृति का है और इस पर याचिका नहीं बनती।

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 की धारा 69 का हवाला देते हुए कहा कि इस अधिनियम के तहत एसजीपीसी को कर्मचारियों की नियुक्ति, सेवा शर्तें तय करने, निलंबन और बर्खास्तगी तक का अधिकार दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए अदालत ने दो टूक कहा कि एसजीपीसी के सेवा नियम कानून का बल रखते हैं और उनके उल्लंघन पर क्षेत्राधिकार पूरी तरह लागू होता है। केवल जांच लंबित होने या आरोप लगाए जाने के आधार पर सेवानिवृत्त कर्मचारी के रिटायरमेंट लाभ रोकना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
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