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ट्रंप के नियुक्त जजों ने ही टैरिफ पर राष्ट्र ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 37

वॉशिगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ को असंवैधानिक ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने न केवल देश की व्यापार नीति को प्रभावित किया है, बल्कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के अधिकारों की सीमा पर भी एक स्पष्ट रेखा खींच दी है। खास बात यह रही कि नौ सदस्यीय पीठ में शामिल तीन ट्रंप के नियुक्त न्यायाधीशों में से दो ने बहुमत के साथ ट्रंप के खिलाफ फैसला दिया, जबकि एक ने असहमति जताई। यह निर्णय राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों, कांग्रेस की कराधान संबंधी भूमिका और “व्यापक प्रश्न सिद्धांत” की संवैधानिक व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है।














  
क्या था मामला?  


राष्ट्रपति ट्रंप ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत राष्ट्रीय आपातकालीन शक्तियों का हवाला देते हुए कई देशों पर व्यापक वैश्विक टैरिफ लगाए थे। प्रशासन का तर्क था कि यह कानून राष्ट्रपति को आयात “नियंत्रित” करने का अधिकार देता है, जिसमें टैरिफ लगाना भी शामिल है। हालांकि, कई व्यवसायिक समूहों और राज्यों ने इस कदम को अदालत में चुनौती दी। उनका कहना था कि संविधान के तहत कर और टैरिफ लगाने का अधिकार कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।




  
बहुमत का फैसला: राष्ट्रपति की शक्ति सीमित



मुख्य न्यायाधीश जॉन राबर्ट्स द्वारा लिखे गए 6-3 के बहुमत फैसले में अदालत ने साफ कहा कि IEEPA राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का स्पष्ट अधिकार नहीं देता। राबर्ट्स ने अपने निर्णय में लिखा, “आज हमारा कार्य केवल यह तय करना है कि आयात को ‘नियंत्रित’ करने की शक्ति क्या टैरिफ लगाने की शक्ति को समाहित करती है। ऐसा नहीं है।” अदालत ने माना कि ‘नियंत्रण’ (regulate) शब्द का अर्थ स्वचालित रूप से कर या शुल्क लगाने की शक्ति नहीं माना जा सकता। यदि कांग्रेस राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की शक्ति देना चाहती, तो वह इसे स्पष्ट और शर्तों के साथ लिखती।




  
ट्रंप के नियुक्त जजों की भूमिका



फैसले की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि ट्रंप द्वारा नियुक्त तीन न्यायाधीशों में से दो नील गोरसच और एमी कोनी बैरेट बहुमत के साथ खड़े रहे। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश राबर्ट्स के तर्क का समर्थन किया। इन दोनों के अलावा बहुमत में तीन उदारवादी न्यायाधीश सोनिया सोतोमयोर, एलेना केगन और केतनजी ब्राउन जैक्सन भी शामिल रहीं। इस तरह कुल छह न्यायाधीशों ने मिलकर राष्ट्रपति की टैरिफ नीति को अवैध करार दिया।  




  
“व्यापक प्रश्न सिद्धांत” का हवाला  


बहुमत ने अपने फैसले में “व्यापक प्रश्न सिद्धांत” (Major Questions Doctrine) का उल्लेख किया। इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई कार्यकारी निर्णय व्यापक आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव डालता है, तो उसके लिए कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति आवश्यक होती है। अदालत ने कहा कि वैश्विक स्तर पर व्यापक टैरिफ लगाना एक ऐसा निर्णय है जिसका अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में राष्ट्रपति केवल सामान्य शब्दों की व्याख्या के आधार पर यह शक्ति अपने पास नहीं ले सकते। संविधान के अनुच्छेदों का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया कि कर और टैरिफ लगाने की शक्ति कांग्रेस को दी गई है, जो जनता के प्रति जवाबदेह विधायी संस्था है।

  
अल्पमत का मत: प्रशासन के पक्ष में तर्क



फैसले से असहमति जताने वाले तीन न्यायाधीशों में क्लेरेंस थॉमस, सैमुअल एलिटो और ब्रेट कैवना शामिल थे। ब्रेट कैवना, जिन्हें ट्रंप ने ही सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था, ने अपने असहमति मत में लिखा कि टैरिफ आयात को नियंत्रित करने का एक पारंपरिक और सामान्य उपकरण है। उनके अनुसार, IEEPA का पाठ, उसका इतिहास और पूर्व कानूनी मिसालें प्रशासन के पक्ष का समर्थन करती हैं। कैवना ने चेतावनी दी कि इस फैसले से चीन, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों पर अनिश्चितता पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति को आपातकालीन परिस्थितियों में लचीलेपन की आवश्यकता होती है, और अदालत को कार्यपालिका के विवेक में अत्यधिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

  
राजनीतिक और संस्थागत प्रभाव



यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन मध्यावधि चुनावों की तैयारी में है। राष्ट्रपति ने पहले ही अदालत के निर्णय को “निराशाजनक” बताया है और संकेत दिया है कि वे अन्य कानूनी रास्तों से टैरिफ नीति को आगे बढ़ा सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला अमेरिकी संस्थाओं के बीच शक्ति संतुलन (checks and balances) का उदाहरण है। खासकर इसलिए क्योंकि ट्रंप-नियुक्त जजों ने भी राष्ट्रपति के खिलाफ फैसला दिया, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता का संदेश जाता है।

  
व्यापार नीति पर संभावित असर



सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से अमेरिका की व्यापार नीति में अस्थायी अनिश्चितता पैदा हो सकती है। यदि प्रशासन नए कानूनी प्रावधानों के तहत टैरिफ लागू करने की कोशिश करता है, तो उन्हें कांग्रेस की स्वीकृति या अन्य विशिष्ट कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों के दायरे को लेकर भी एक मिसाल बनेगा। इससे यह स्पष्ट संकेत गया है कि व्यापक आर्थिक प्रभाव वाले फैसलों के लिए विधायी मंजूरी जरूरी है।

  
शक्तियों के विभाजन की पुनर्पुष्टि



सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल टैरिफ नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी लोकतांत्रिक ढांचे में शक्तियों के विभाजन की पुनर्पुष्टि भी है। नौ सदस्यीय पीठ में दो ट्रंप के नियुक्त न्यायाधीशों का बहुमत के साथ खड़ा होना इस बात को रेखांकित करता है कि न्यायिक निर्णय राजनीतिक निष्ठा से परे संवैधानिक व्याख्या पर आधारित होते हैं। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि ट्रंप प्रशासन आगे कौन सा कानूनी रास्ता अपनाता है और क्या कांग्रेस इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट कानून लाती है। फिलहाल इतना तय है कि यह फैसला अमेरिकी संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है।  







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