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‘श्रीरामार्चनम’ से संघ के घोष दल ने की रामलला की स्तुति, सरयू तट से राम मंदिर पहुंचा वादक दल

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सरयू तट से पथ संचलन करते हुए राम मंदिर में पहुंचा वादक दल।



जागरण संवाददाता, अयोध्या। भारतीय धुनों पर गणवेशधारियों के उठते-गिरते कदम, विभिन्न वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनि, एक प्रकार का सुर-ताल बांधते स्वयंसेवक। कुछ ऐसा ही अलौकिक दृश्य रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोष दल की ओर से आयोजित किए गए ‘श्रीरामार्चनम’ का। भारतीय रागों पर आधारित स्वरलहरियां संपूर्ण वातावरण को अद्वितीय बनाती रहीं।

अयोध्याधाम के लोगों ने संघ का ऐसा अनूठा पथ संचलन देखा तो हर कोई अभिवादन करने को मजबूर हो उठा। सजीव प्रसारण के माध्यम से देश भर के लोगों ने संघ के अनुशासन का ऐसा दृश्य देखा। रामनगरी में आयोजित हुआ ‘श्रीरामार्चनम’ कार्यक्रम रामलला के प्रति श्रद्धा, समर्पण व राष्ट्रभावना को समर्पित रहा।

दिल्ली प्रांत के घोष दल के स्वयंसेवकों ने पारंपरिक गणवेश में घोष दल प्रमुख रजत जैन के नेतृत्व में रविवार को अपराह्न सवा तीन बजे सरयू तट पर वंदन से पथ संचलन प्रारंभ किया। विभिन्न प्रकार की धुनों के माध्यम से प्रभु श्रीराम की अर्चना करते हुए निकले स्वयंसेवक वीणा चौक पर रुके और यहां बलिदानी कारसेवकों व स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को स्वराञ्जलि अर्पित की।

  

कुछ क्षणों के उपरांत घोष दल हनुमानगढ़ी पर पहुंचा और यहां बजरंग बली की स्तुति की। इससे आगे रामपथ पर लगभग 10 मिनट रुक कर स्थिरवाद किया। तत्पश्चात घोष दल ने रामजन्मभूमि परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार पर ‘श्रीरामार्चनम’ की प्रस्तुति दी।

संपूर्ण संचलन में वादक दल जिस ओर से निकला, उधर के विक्रेता व राहगीर भी अपने स्थान पर खड़े होकर वादकों का अभिनंदन करते दिखे। सभी एक लय और धुन में वाद्य यंत्र बजा रहे घोष दल को अपलक निहरते रहे। संघ के घोष वादक पारंपरिक वाद्यों से भारतीय सांगीतिक परंपरा की गरिमा सजीव करते दिखाई दिए।

वाद्य यंत्रों में शंख (बिगुल), शृंग (तूर्य) एवं वेणु (बांसुरी) की मनोहारी रचनाएं (स्वर) और आनक (छोटा ड्रम) की ओजस्वी व उत्साहवर्धक प्रस्तुतियां जीवंत होती रहीं। समस्त घोष रचनाएं विभिन्न भारतीय शास्त्रीय रागों एवं निर्धारित तालों पर आधारित रहीं। कार्यक्रम की प्रस्तुति में शास्त्रीयता एवं अनुशासन का समन्वय साथ दिखाई दे रहा था। रागों की मधुरता व ताल की संतुलित गति से संपूर्ण वातावरण राष्ट्रभावना से ओत-प्रोत होता रहा।

  

कार्यक्रम में चार प्रमुख गीतों की घोष रचनाएं वीर सावरकर रचित “जयस्तुते”, “राम स्तुति”, “राम भक्त ले चला रे राम की निशानी” और “श्रीरामचंद्रकृपालु भजमन्” वातावरण को प्रेरणादायी व भक्तिमय बनाती रहीं। ‘श्रीरामार्चनम’ का उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग तक भारतीय परंपरा, अनुशासन, सांस्कृतिक गौरव व राष्ट्रभक्ति का संदेश पहुंचाना रहा। घोष वादन ने अपने सामूहिक अनुशासन, सांगीतिक उत्कृष्टता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए विशेष पहचान बनाए रखी।

कार्यक्रम के अंत में घोष दल ने राम मंदिर परिसर में ग्रीन हाउस मैदान के सामने रामलला को “श्रीरामार्चनम्” की प्रस्तुति दी। इसके बाद परकोटे के सिंह द्वार पर घोष शाखा लगाई गई। 45 मिनट की शाखा के बाद वादक दल ने रामलला का दर्शन भी किया।

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