मातृ संस्कार समागम को संबोधित करती विश्वमांगल्य सभा की अखिल भारतीय संयोजिका गीता धामी।
राज्य ब्यूरो, देहरादून। विश्वमांगल्य सभा की अखिल भारतीय संयोजिका गीता धामी ने मातृ संस्कार समागम को संबोधित करते हुए कहा कि सामाजिक सेवा ही मानवीय जीवन का मूल है और जब सेवा किसी परिवार की परंपरा बन जाती है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि हमारी सनातन संस्कृति में ‘सेवा परमो धर्मः’ केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविक साधना है।
मातृ संस्कार समागम में संबोधित करते हुए उन्होंने सेवा-समर्पित परिवारों की सराहना की और कहा कि जब परिवार समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के प्रति संवेदनशील होते हैं, तभी करुणा और समरसता का विस्तार होता है।
उन्होंने कहा कि माँ समाज निर्माण की आधारशिला है, जो बच्चों में सेवा, त्याग और संवेदना के संस्कार विकसित करती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में तकनीकी प्रगति और व्यस्त जीवनशैली के कारण परिवारों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। ऐसे समय में सेवा-निष्ठ परिवार समाज के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।
सफलता का वास्तविक मापदंड केवल व्यक्तिगत उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि समाज के प्रति योगदान होना चाहिए।
विश्वमांगल्य सभा की राष्ट्रीय परामर्शदाता वृषाली ताई जोशी ने कहा कि बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संवेदना, सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी पाठ पढ़ाया जाना आवश्यक है।
उन्होंने परिवार को पहली पाठशाला बताते हुए कहा कि यहीं से अच्छे नागरिक तैयार होते हैं। कार्यक्रम में विश्वमांगल्य सभा के राष्ट्रीय परामर्शदाता प्रशांत हरतालकर एवं विश्वमांगल्य सभा की अखिल भारतीय संयोजक डा. अनुराधा यादव ने सभी परिवारों से आह्वान किया कि वे संवाद को बनाए रखें, सेवा को जीवन का हिस्सा बनाएं और जरूरतमंदों की सहायता करें।
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