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सत्य ही सनातन है, पढ़ें वेदों से रामचरितमानस तक की यात्रा

cy520520 2026-2-16 13:26:28 views 346
  

वैदिक सनातन धर्म और वैश्विक दृष्टि।



मोरारी बापू, (कथावाचक)। सनातन धर्म ही एकमात्र शाश्वत परंपरा है, जो ऐतिहासिक सीमाओं से परे है और सभी आध्यात्मिक मार्गों के सार को समाहित करती है। इसके मूल में सत्य, प्रेम, करुणा और अहिंसा हैं। सनातन धर्म की पवित्र ग्रंथ परंपरा वेदों से शुरू होती है, जिसके बाद उपनिषद, पुराण और श्रीमद्भगवद्गीता आते हैं। गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस इस परंपरा का अंतिम ग्रंथ है। यदि सनातन धर्म के आध्यात्मिक प्रतीकवाद का काव्यात्मक वर्णन किया जाए तो कहा जा सकता है कि इसकी धारा गंगा है। इसका पवित्र पर्वत कैलास है। इसका वृक्ष अक्षय वट है।
दिव्यास्त्र सुदर्शन चक्र

इसका ग्रंथ वेद है और इसका दिव्यास्त्र सुदर्शन चक्र है। इसकी सुखदायक शांति चंद्रमा है और इसका प्रकाश सूर्य है। सनातन धर्म में सभी का समावेश है। वह अपने अंदर सबको समाहित किए है। इसका कब आरंभ हुआ, यह गणना नहीं है, शेष सबकी काल गणना है कि कौन कब से है। मानस में सनातन शब्द नहीं आया, मगर मानस में सब कुछ सनातन है। मानस का सत्य ही सनातन धर्म है। प्रेम ही सनातन धर्म है। करुणा ही तो सनातन धर्म है। अहिंसा ही तो सनातन धर्म है।
वैश्विक और दिक का अर्थ

हमारी संस्कृति वैदिक सनातन धर्म है। वै का अर्थ है वैश्विक और दिक का अर्थ दिशा। जो संस्कृति विश्व को दिशा दे, वह वैदिक है। जो धर्म वैश्विक दिशा दर्शाता है, उसी का नाम है वैदिक सनातन धर्म है। जो वैश्विक मार्गदर्शन करता है, इस दिशा में हमें प्रेरित करता है, गति देता है और लक्ष्य तक पहुंचने के लिए आशीर्वाद देता है। विश्व मंगल के लिए जो धाराएं आईं, उनमें जो सनातन मूल्य हैं, उन्हें हम नकार नहीं सकते। सनातनता परम सत्य है। हमें इन बातों में नहीं जाना कि कौन हीन है, कौन श्रेष्ठ है। जनवरी में जैन मुनि ने राजधानी में राम कथा कराई। यह भी सनातन विचार का परिणाम है।
पांच देवों की विशेष मान्यता

सनातन में पांच देवों की विशेष मान्यता है। पांच देवों के संदेश युवा अपने हृदय में धारण करें। गणेश विवेक के देव हैं। आवश्यकता है विवेक की। दूसरे देव, सूर्य की उपासना का अर्थ है कि हम उजाले में जिएं। प्रकाश की तरफ हमारी गति हो। सनातन कहता है कि युवाओं को प्रकाश में जीने का संकल्प लेना चाहिए। तीसरे देव हैं विष्णु। विष्णु यानी व्यापकता। हमारे विचार विशाल हों। संकीर्णता के कारण अच्छी विचारधारा भी लड़ रही हैं। विशाल दृष्टिकोण की आवश्यकता हमेशा रही है, मगर आज और भी अधिक है। चौथे देव शिव हैं विश्वास। विश्वास के बिना सब अधूरा है। उसके तीन नेत्र हैं। पांचवी, दुर्गा श्रद्धा हैं। ये पंच देव की आध्यात्मिक पूजा है।

सनातन विचार कहते हैं कि गुरु में ये पांचों हैं। सनातन सप्तक है। सात वस्तुओं से सनातन जुड़ा हुआ है। ब्रह्म सनातन है। बुद्ध पुरुष सनातन है। हमारा स्वभाव सनातन है। जीव सनातन है। कुलधर्म सनातन है। धर्म सनातन है। सत्य सनातन है। सत्य, प्रेम, करुणा और अहिंसा... मेरी दृष्टि में मूल सनातन धर्म के सिद्धांतों में हैं।
मानस सनातन धर्म कथा

सिद्धांत शब्द भी ठीक नहीं लगता। सनातन धर्म के स्वभाव में हैं। इसलिए राजधानी की मानस सनातन धर्म कथा के लिए चार पंक्ति मानस की उठाईं। एक पंक्ति में सनातन धर्म का सत्य है... धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।। दूसरी में प्रेम जो सनातन धर्म की बातें कर रहा है, वह है... रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जान निहारा।। तीसरी में सनातन की करुणा है... जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।। चौथी पंक्ति में अहिंसा है.. परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा।।
सनातन धर्म के आठ प्रधान लक्षण

वैदिक सनातन धर्म के आठ प्रधान लक्षण हैं। लक्षण को मैं स्वभाव कहूंगा। सत्य, सनातन धर्म का स्वभाव है। ऋत जो परिवर्तन करती है। उसका एक सार्वभौम नियम है, एक वैश्विक स्वभाव। यज्ञ सनातन धर्म का स्वभाव है। यज्ञ यानी आहुति देना। अपने लिए नहीं, बल्कि जगत के लिए। धर्म को कर्म में परिवर्तित करना है। वस्तु वचनात्मक ना रहे, रचनात्मक हो जाए। पूर्व जन्म और पुनर्जन्म सनातन धर्म की देन है। ध्यान और वर्ण आश्रम भी सनातन की देन हैं। ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम आदि भी सनातन में ही हैं। मोक्ष की यात्रा भी सनातन का लक्षण है।
सनातन पुरुष के कुछ लक्षण

सनातन है तो सनातन पुरुष भी हैं। सनातन पुरुष के कुछ लक्षण हैं। सनातन पुरुष वह है, धीरे-धीरे जिसके सभी विषय विराम लेने लगें। धीरे-धीरे। इसकी एक कसक होनी चाहिए कि अभी तक वैराग्य नहीं आया। विषय के साथ विकार भी जुड़ा है। विषय के साथ संस्कार भी जुड़ा है। जिसका संग हमें बहुत अच्छा लगे, ऐसा कोई साधु सनातन है। असहाय को देखकर जिसके हृदय में करुणा जागे, संवेदना प्रकट हो। जो बुद्धपुरुष सज्जनों से मैत्री करता हो, श्रेष्ठों को आदर देता हो, वह चलता-फिरता सनातन धर्म है।
सनातन धर्म का कोई आदि अंत नहीं

सनातन धर्म का कोई आदि अंत नहीं। उसे मिटाने की कोशिश हुई, लेकिन किसी को निर्मूल तब किया जाए, जब मूल नीचे हो। सनातन धर्म का मूल ऊर्ध्व मूल है। उसकी शाखाएं नीचे आई हैं, मूल ऊपर है। और वहां तक हम पहुंच नहीं पाते। धर्म में जब संकीर्णता आ जाती है, अपने-अपने आग्रह आ जाते हैं, तब कूपमंडूकता आ जाती है। सनातन धर्म में संकीर्णता नहीं, व्यापकता है। देश, काल और आज के समाज में इसकी आवश्यकता है।
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