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बिहार के धन से बेगानों की झोली भर रहे बैंक। सांकेतिक तस्वीर
विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। बोरिया-बिस्तर बांध लेने की सरकार की चेतावनी भी जुबान से आगे नहीं बढ़ती, लिहाजा बैंक बिहार में साख का वार्षिक लक्ष्य कभी पूरा ही नहीं करते।
कुछ ऐसी ही स्थिति पूर्व और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों की भी है। बिहार में जब साख-जमा अनुपात (सीडी रेशियो) 51 प्रतिशत था, तब राष्ट्रीय औसत 80 प्रतिशत रहा।
इतना बड़ा अंतर है। आश्चर्यजनक यह कि उसी दौरान दक्षिणी राज्यों के कुछ जिलों में सीडी रेशियो 200 प्रतिशत से भी अधिक रहा। स्पष्ट है कि बिहार आदि प्रदेशों की जमा राशि से बैंक उन प्रदेशों में कर्ज दे रहे, जो पहले से ही विकसित हैं।
बैंकों में सर्वाधिक जमा करने वाले देश के 25 जिलों में से एक पटना भी है, लेकिन सर्वाधिक ऋण प्राप्त करने वाले 25 जिलों में नहीं।
यह भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) के ताजा अध्ययन का निष्कर्ष है, जो बिहार में राज्य-स्तरीय बैंकर्स समिति का संयोजक भी है। स्वयं एसबीआइ का सीडी रेशियो भी बिहार को मुंह चिढ़ाने वाला है।
क्षेत्रवार सीडी रेशियो (वित्तीय वर्ष 2024-25)
क्षेत्र औसत 2004-2014 औसत 2015-2025 वास्तविक 2024-25
उत्तरी
73.6
79.3
78.6
पूर्वोत्तर
35.9
43.3
55.5
पूर्वी
49.3
43.9
49.2
केंद्रीय क्षेत्र
45.1
50.7
58.6
पश्चिमी
84.4
92.6
93.2
दक्षिणी
88.2
89.0
94.7
राष्ट्रीय औसत
73.1
76.4
80.1
बिहार
29.3
39.3
51.4
सीडी रेशियो कम होने के प्रमुख कारण
बड़े उद्योग और व्यावसायिक परियोजनाओं की कमी
बैंकों की जोखिम से बचने की प्रवृत्ति
कोलेटरल और क्रेडिट हिस्ट्री की कमी
पूंजी का बहिर्गमन
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कमजोर भागीदारी
संयोगवश, एसबीआइ की इस रिपोर्ट के तत्काल बाद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने अग्रणी बैंक योजना के मसौदा में संशोधन किया है।
इसके जरिये उसने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में सीडी रेशियो को कम-से-कम 60 प्रतिशत रखें। बिहार के लिए अभी यह सपना ही है।
हालांकि, औद्योगिक परिवेश में सुधार और बैंकिंग पहुंच बढ़ाकर सीडी रेशियो को ठीक किया जा सकता है। इससे राज्य में स्थानीय पूंजी का बेहतर उपयोग होगा और विकास की गति तेज होगी।
सीडी रेशियो बढ़ाने के उपाय
एमएसएमई और कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाना
बैंकों के साथ आउटरीच और सरकारी दबाव
इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहित करना
एनपीए कम करना और क्रेडिट एक्सेस आसान बनाना
प्राइवेट और फिनटेक कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना
बिहार में सीडी रेशियो कम होने के पीछे कई संरचनात्मक और जोखिम से जुड़े कारण हैं। राज्य में बड़े पैमाने पर उद्योग-धंधे नहीं हैं, जिससे बड़ी मात्रा वाले ऋण की मांग कम रहती है।
छोटे उद्यमियों, किसानों या नए व्यवसायियों को ऋण देने में बैंक हिचकिचाते हैं, क्योंकि उन्हें गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के बढ़ने की आशंका होती है।
हालांकि, इधर के वर्षाें में एनपीए कम हुआ है, लेकिन यह धारणा अभी प्रभावी है। ग्रामीण परिक्षेत्रों में कई लोगों के पास मजबूत संपत्ति (कोलेटरल) या अच्छी क्रेडिट हिस्ट्री नहीं होती।
इसलिए बिहार का जमा धन अन्य राज्यों (महाराष्ट्र, तेलंगाना, तमिलनाडु आदि) में ट्रांसफर हो जाता है, जहां निवेश के बेहतर अवसर हैं।
इस कारण श्रम का पलायन भी हो रहा। अभी बिहार से प्रतिवर्ष औसतन दो से ढाई लाख करोड़ रुपये दूसरे राज्यों में जा रहे। इससे बिहार में निवेश और रोजगार कम हो रहा।
अगर इस धन का निवेश बिहार में हो, तो रोजगार के नए अवसरों के साथ तेज आर्थिक-औद्योगिक विकास की संभावना बढ़ेगी। |
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