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हमारे उत्पादों की गुणवत्ता ही तय करेगी ट्रेड डील का भविष्य: अजय श्रीवास्तव

Chikheang 1 hour(s) ago views 441
  

अजय श्रीवास्तव ने भारत के व्यापार समझौतों पर की चर्चा



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ट्रेड डील (व्यापार समझौते) वस्तु विनिमय से शुरू होकर आज के डिजिटल युग में नए रूप में सामने आया है। लेकिन इस पर कभी आम जनमानस में उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी कि आज हो रही है।

बाजार के तय नियम-कायदों को तोड़कर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ के बाद एक ओर जहां दुनियाभर में लोग इस शब्द को लेकर सचेत हुए हैं, वहीं उनकी जिज्ञासा भी बढ़ी है।

खासतौर पर जब भारत-अमेरिका ट्रेड डील के फायदे-नुकसान को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है। इन सबके बीच यह जानना रोचक होगा कि विकसित देशों की लंबी-चौड़ी टीम के सामने भारत के दो-तीन अधिकारियों की टीम ही नेगोशिएट करती है। 12 हजार टैरिफ लाइन्स (उत्पादों की सूची) उनके लिए \“कर्मग्रंथ\“ है।

पूर्व यूरोपीय यूनियन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, चीन, श्रीलंका, चिली सहित 20 से ज्यादा देशों से नेगोशिएट कर ट्रेड डील फाइनल करने वाली टीम का हिस्सा रहे भारत सरकार के पूर्व ट्रेड सर्विस आफिसर और ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआइ) के निदेशक अजय श्रीवास्तव  कहते हैं कि ट्रेड डील तो कागजी दस्तावेज है।

बाजार पर किसका कब्जा होगा, यह तो हमारे उत्पादों की गुणवत्ता से ही तय होगा। \“ट्रेड\“ से सुपर पावर बनने की बढ़ती प्रवृत्ति के मद्देनजर वह युवा अधिकारियों को और ज्यादा प्रशिक्षित किए जाने का सुझाव भी देते हैं।

व्यापार नीति निर्माण, डब्ल्यूटीओ और एफटीए वार्ता जैसे विषयों पर गहरी समझ रखने वाले श्रीवास्तव ने वर्ष 2022 में वीआरएस लिया और जीटीआरआइ थिंक टैंक की स्थापना की। इसके जरिये वह ट्रेड डील, उद्योग नीतियों को शब्द जाल से मुक्त कर आसान भाषा में समझाने व जागरूक करने का काम कर रहे हैं।

दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष  ने उनसे ट्रेड डील के अंजाम तक पहुंचने की कड़ियों पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश

भारत ने पिछले छह साल में करीब 10 व्यापार समझौते किए हैं। इसका मतलब है कि करीब 54 प्रतिशत वैश्विक बाजार में पहुंच आसान हुई है। इसका फायदा उठाने के लिए भारत खुद में कितना तैयार है या इसमें क्या बाधाएं आप देखते हैं?  

ट्रेड डील तो तकनीकी टेक्निकल शब्दावली से भरा एक दस्तावेज है। भारतीय कंपनियां व्यापार समझौतों का उपयोग कर रही हैं, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उत्पादों की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुंचती है या नहीं। गुणवत्ता ही सबसे बड़ी चुनौती है।

भारत के निर्यातकों को अपने प्रोडक्ट्स की गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय मानक स्तर तक लेकर जाना होगा। खास तौर पर यूरोपीय बाजार के मानकों को पूरा करना कठिन है। मेरा मानना है कि भारत को अगले दस साल में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को डेवलप करना चाहिए। तभी आने वाले समय में इसका फायदा मिलेगा।

कहा जा रहा है कि बांग्लादेश को गारमेंट्स सेक्टर में शून्य टैरिफ देकर अमेरिका ने भारत के साथ धोखा किया। यदि कभी हमें लगा कि भारत को नुकसान हो रहा है, तो क्या विकल्प है?  

आंकड़ों के अध्ययन के बाद मैं दावे से कह सकता हूं कि बांग्लादेश को जीरो टैरिफ देने के बाद भी इसका बहुत ज्यादा फायदा उनको नहीं मिलेगा। दरअसल जीरो टैरिफ तभी होगा, जब वह अमेरिकी कपास का उपयोग कर रेडीमेड गारमेंट्स (कपड़ा) बनाएंगे।

अब वहां छोटे और मध्यम वर्ग की कंपनियों के पास इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है कि वे अमेरिकी कपास को प्रोसेस कर पाए। इससे बहुत कम व्यापारी इसका फायदा ले पाएंगे। वही अमेरिकी कपास की वजह से वहां के स्थानीय कपास उत्पादकों को बहुत नुकसान होगा। मेरे हिसाब से तो अमेरिका ने बांग्लादेश के छोटे व्यापारियों को इस डील के जरिए लूट लिया।

हमारे देश के लिए ट्रेड डील अच्छा है या नहीं, एक आम भारतीय यह कैसे समझ सकता है?   

पहला, देश का निर्यात बढ़े। दूसरा, आयातित वस्तुएं उद्योगों के लिए कच्चे माल के रूप में उपयोग हों। तीसरा, किसानों और छोटे व्यापारियों को नुकसान न हो। चौथा, डंपिंग से घरेलू बाजार प्रभावित न हो।

भारत अमेरिका डील को लेकर आपकी क्या राय है? यह डील किस ओर झुकी हुई है...भारत या अमेरिका?   

ट्रंप टैरिफ की वजह से मई-दिसंबर 2025 के बीच हमारा एक्सपोर्ट 21 प्रतिशत तक गिर गया है। इस डील से इस स्थिति को थामने में मदद मिलेगी।

इसके बाद ही यदि डील सही नहीं लगे तो क्या विकल्प?  

यह कोई सात जन्मों का बंधन थोड़े ही है...छह महीने का नोटिस देकर कोई भी देश अनुबंध से बाहर आ सकता है। भारत-यूरोपियन यूनियन के बीच डील नहीं हुआ था, तब भी वर्ष 2025 में 26 अरब डालर का निर्यात और 61 अरब डालर का आयात हुआ। डील सिर्फ टैरिफ की ऊंची दीवार को कम करती है। बगैर डील के भी किसी भी देश से कारोबार हो सकता है।

डील की घोषणा होने के बाद इसे लागू करने में कितना समय लगता है?

डील की संयुक्त घोषणा के बाद दोनों देश इसके कानूनी पहलुओं की जांच करवाते हैं, ताकि कहीं कोई पेंच न छूट जाए। इसमें लगभग एक महीने का समय लगता है। इसके बाद डील की घोषणा होती है और इसे संसद या कैबिनेट में पास करवाना होता है।

चूंकि भारत में यह कैबिनेट में पास होता है, तो इसमें ज्यादा समय नहीं लगता है, लेकिन यूके में यह संसद में पास करवाना जरूरी है। यही वजह है कि भारत-यूके डील की घोषणा बहुत पहले हुई, लेकिन अभी तक एग्रीमेंट साइन नहीं हुआ है। वहां इस डील पर संसद में बहस हो रही है।

संसद में पास होने के बाद इसे लागू किया जाएगा। यूरोप के साथ हुई डील के फाइनल एग्रीमेंट पर अभी साइन होना है। जहां तक भारत-अमेरिका डील की बात है तो इसमें अभी तक एक पन्ने का संयुक्त बयान जारी हुआ है, जिसमें मुख्य-मुख्य बिंदुओं का उल्लेख है। अब हर बिंदुओं का विश्लेषण करते हुए सैकड़ों-हजारों पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार होगी।

अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह रिसिप्रोकल टैरिफ लगाएगा, यानी हम जो लगाएंगे, वही टैरिफ हम पर भी लागू होगा। इसमें भारत को विस्तृत रिपोर्ट तैयार करनी होगी।

12 हजार टैरिफ लाइंस की रिपोर्ट से आपका आशय?

हमारे डील में 12 हजार \“टैरिफ लाइंस\“ हैं। यानी आसान भाषा में कहें तो एक टैरिफ लाइन यानी एक उत्पाद। जैसे आईफोन। इससे जुड़े सारे उत्पाद एक टैरिफ लाइन है। अमरूद-लिची जैसे फलों को एक टैरिफ लाइन में रखा गया है।

भले ही भारत-अमेरिका के बीच उत्पादों को लेकर डील हुई है, लेकिन रिपोर्ट में 12 हजार टैरिफ लाइंस का उल्लेख करना होगा। जिन चीजों पर डील हुई है, उनके आगे टैरिफ लिखना होगा, और जिन चीजों के लिए डील नहीं हुआ है, उनके आगे \“नो\“ लिखना होगा।

सिर्फ अमेरिका के साथ ही नहीं, हर देश के साथ डील फाइनल होने के बाद इसी तरह दस्तावेजीकरण करना पड़ता है। कई बार तो यह एक किताब की शक्ल ले लेती है।   

आपके कार्यकाल का सबसे अच्छा डील?       

सबसे अच्छा डील आस्ट्रेलिया के साथ हुआ था। वे अमेरिका की तरह अनावश्यक दबाव नहीं बनाते हैं। अपनी बात कहेंगे, लेकिन यदि उसमें भारत को कोई परेशानी है तो वह समझते हैं।

इसमें हमारी ओर से वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल थे और उनके मंत्री भी बहुत ही समझदार व सुलझे हुए थे। नीचे की टीम से जो बात नहीं बनी, तो उन्होंने आपस में बात कर उसे सुलझा लिया।  

और सबसे कठिन डील कौन सी थी? क्या कोई डील आखिरी मौके पर रद हुई?  

सबसे कठिन डील \“आरसेप\“ की थी। इसमें भारत को मिलाकर 16 देश शामिल थे। इसमें न्यूजीलैंड जैसे फ्री टैरिफ देश शामिल थे। चीन की मंशा यह थी कि चीन जीरो टैरिफ पर उन देशों में अपना माल पहुंचाएगा और वहां से वह भारत के बाजार में पहुंच जाएगा।

डील लगभग फाइनल होने के बाद जब यह बात पकड़ में आई। बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पहुंची। वह चाहते तो किसी अधिकारी को गलती सुधारने को कह सकते थे, लेकिन 4 नवंबर 2019 को समिट में जाकर खुद डील रद किया था।

यदि यह डील हो जाती तो भारत को बहुत नुकसान होता। यह हम सब लोगों के लिए बहुत कठिन दौर था, जब प्रधानमंत्री को इसमें शामिल होना पड़ा था।

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव, डा. मनमोहन सिंह और पीएम नरेन्द्र मोदी....। तीनों ही प्रधानमंत्री आर्थिक सुधारों के पक्षधर हैं। तीनों के कार्यकलाप में क्या अंतर पाते हैं? डील को लेकर पीएमओ से क्या निर्देश मिलते हैं?     

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के कार्यकाल में आर्थिक सुधारों और बाजार खोलने से निर्यात और जीडीपी बढ़ी। डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में वार्ताओं से पहले स्पष्ट नीति निर्देश देने की व्यवस्था थी।

उस समय टीईआरसी (ट्रेड एंड इकनामिक रिलेशंस कमेटी) कमेटी के सामने समझौते के हर दौर से पहले वाणिज्य मंत्रालय एक प्रेजेंटेशन देती थी, जिसमें सभी केबिनेट मंत्री होते थे। डॉ. सिंह भी मौजूद होते थे। इस बैठक में ही निर्णय हो जाता था कि हमें क्या बात करना है।

एक तरह से  हमें गाइडलाइन मिल जाती थी। इससे हमें पता होता था कि हमें डील को किस दिशा में ले जाना है। पीएम नरेन्द्र मोदी की जीएसटी व श्रम सुधार और पीएलआइ योजनाएं औद्योगिक विकास को गति दे रही हैं।

समझौता वार्ता प्रक्रिया कैसे चलती है?

किसी भी देश के साथ समझौता करने से पहले वाणिज्य विभाग आंतरिक समीक्षा करता है। लाभ-हानि का आकलन कर रिपोर्ट शीर्ष नेतृत्व को भेजी जाती है। अनुमति मिलने पर संबंधित देश को वार्ता की इच्छा व्यक्त की जाती है। इसके बाद दोनों देश संयुक्त अध्ययन समूह बनाते हैं जिसमें अधिकारी, विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री शामिल होते हैं।

यह समूह 200-300 पन्नों की संयुक्त रिपोर्ट तैयार करता है जिसमें संभावित लाभों का विश्लेषण होता है। रिपोर्ट पर सहमति बनने पर वार्ता की आधिकारिक घोषणा होती है और दोनों देश मुख्य वार्ताकार (चीफ नेगोशिएटर) नियुक्त करते हैं।

विभिन्न विषयों जैसे वस्तुएं, सेवाएं, निवेश, मूल नियम आदि—के लिए अलग-अलग टीमें बनाई जाती हैं। सभी विषयों पर सहमति बनने के बाद संयुक्त घोषणा की जाती है।

एक डील फाइनल होने में अमूमन कितना समय लगता है? क्या बैठकों की संख्या तय होती है?

कोई निश्चित समय नहीं होता। यूएई और ओमान समझौते तीन-चार महीने में पूरे हुए, जबकि भारत-ईयू समझौते में 19 वर्ष लगे।

एक-एक टीम में कितने सदस्य होते हैं?  

(हंसते हुए....) जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों की टीमों में 50 से अधिक सदस्य होते हैं, जबकि भारतीय टीम
अपेक्षाकृत छोटी होती है। वार्ता समूह में अक्सर भारत की ओर से केवल एक-दो अधिकारी ही बैठते हैं।

छोटी टीम होने के बावजूद भारतीय अधिकारी कुशल वार्ताकार होते हैं। जब मैं टेबल पर बैठता था तो मेरे साथ एक या दो सदस्य होते थे और मेज की दूसरी ओर कई बार 10 लोगों की टीम होती थी।

सीमित संसाधनों में बेहतर परिणाम देने की क्षमता हमारी ताकत है, लेकिन भविष्य के लिए अधिक विशेषज्ञता और प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

छोटी टीम होना फायदेमंद है या कमजोरी?

इसमें कोई दोमत नहीं है कि भारतीय अधिकारी नेगोशिएट करने में माहिर होते हैं। कई बार हमारी छोटी टीम का दूसरे देश के प्रतिनिधियों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। वह दबाव में भी रहते हैं कि यहां के अधिकारी छोटी टीम के साथ बड़ी से बड़ी डील फाइनल करने में सक्षम हैं।

अनौपचारिक बातचीत में दूसरे देश के प्रतिनिधि इसका उल्लेख भी करते हैं। सीमित संसाधनों में बेहतर परिणाम के मद्देनजर तो यह फायदेमंद है। यह कमजोरी तो नहीं है, लेकिन 20 से ज्यादा देशों के नेगोशिएटरों की कार्यप्रणाली को करीब से देखने के बाद मैंने महसूस किया कि इस क्षेत्र में दुनिया के अन्य देश काफी तेजी से अपने कामकाज में बदलाव ला रहे हैं।

मेरा सुझाव है कि भारत को और फोकस होने की जरूरत है। नेगोशिएट टेबल पर दूसरे देश का एक ही नेगोशिएटर बात करता है, लेकिन उसके साथ बैठे आठ-नौ जूनियर अधिकारी देखते हैं, सीखते हैं और प्रशिक्षित होते रहते हैं।

इसकी तुलना में भारतीय टीम के एक या दो सदस्य ही प्रशिक्षित हो पा रहे हैं। आने वाले समय में जब \“ट्रेड\“ ही सुपर पावर बनने का हथियार है तो हमें भी तैयार होना होगा।

बतौर ट्रेड आफिसर भारतीय अधिकारियों को भविष्य में किस तरह का कौशल विकसित करना चाहिए?

एक उदाहरण देता हूं...भारत-यूरोप डील के दौरान मेरी काउंटर पार्ट एक महिला अधिकारी थीं। मैंने उनसे पूछा कि अब अपने देश लौटकर आप और क्या-क्या काम देखेंगी?

उन्होंने बताया कि मेरे पास सिर्फ यही काम है। यहां से जाकर मैं सालभर उन सारी फैक्टरियों का दौरा करूंगी, जिन पर डील हुई है। उनकी परेशानियों, उनके मुद्दे को नोट करूंगी। ताकि अगली डील में मैदानी मुद्दों को रख सकूं। एक ही काम पर फोकस होने की वजह से वह मैदानी तौर पर ज्यादा अपडेट होंगी।

इसके अलावा बीते सात-आठ में मैंने एक बड़ा बदलाव महसूस किया। सात-आठ साल पहले तक साउथ कोरियन, चीन और जापान के नेगोशिएटर्स \“टंग टाइट\“ होते थे, यानी अंग्रेजी नहीं जानने की वजह से ज्यादा बोलने से हिचकिचाते थे, लेकिन अब तस्वीर बदल गई।

भाषा पर पकड़ के साथ वे ज्यादा फोकस्ड और विषय विशेषज्ञता के साथ डील करने आते हैं। वे खुद को अपडेट कर रहे हैं, तो हमें भी बेहतर टीम बनानी चाहिए। भारतीय अधिकारियों में नेगोशिएशन स्किल (कौशल) की कोई कमी नहीं है।

हमें अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं है। बस जिसके पास जो काम है, वही करने दिया जाए। भारतीय अधिकारियों के पास ट्रेड डील के अलावा भी बहुत काम होते हैं।

जब आप पहली डील का हिस्सा बने, तब भारत का निर्यात कितना था और आज किस स्थिति में है?  

1991 का दौर अत्यंत महत्वपूर्ण था। भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण शुरू हुआ ही था। मेरी पहली पोस्टिंग मुंबई स्थित चीफ कंट्रोलर ऑफ इम्पोर्ट एंड एक्सपोर्ट कार्यालय में हुई।

तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम उद्घाटन के लिए आए और वहीं से पहली एक्सिम स्क्रिप जारी की। एक्सिम स्क्रिप निर्यातकों को दिया जाने वाला लाइसेंस था। पहले ऐसा लाइसेंस प्राप्त करने में छह महीने लगते थे, लेकिन कंप्यूटरीकृत प्रक्रिया ने इसे घटाकर 24 घंटे कर दिया। यह बदलते भारत की तस्वीर दिखाने का प्रयास था।

आयात-निर्यात प्रक्रिया आसान होने के साथ निर्यात तेजी से बढ़ा। 1990 में भारत का निर्यात 18 अरब डॉलर था, जो आज वस्तुओं और सेवाओं को मिलाकर लगभग 820 अरब डॉलर हो चुका है। अन्य देशों की तरह भारत सरकार भी व्यापार बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण साझेदार देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते करती है।

आज तक भारत 20 व्यापक व्यापार समझौते और छह सीमित दायरे वाले समझौते कर चुका है। छह फरवरी को अमेरिका के साथ घोषित ढांचा समझौता हमारा बीसवां व्यापक समझौता माना जा सकता है।


आप इंजीनियरिंग के विद्यार्थी रहे हैं। ट्रेड सर्विस में इस डिग्री का क्या फायदा मिला?  

मैंने तो अपने कार्यकाल में यह अनुभव किया कि मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई इस क्षेत्र में बहुत काम आई। ट्रेड डील तो टेबल पर होती है, लेकिन उसे लागू करने के लिए कई बार हमें फैक्टरियों का दौरा करना पड़ता था।

यानी कौन सी चीज कैसे बन रही है? उसका सोर्स (मूल) क्या और कहां है...इस पर टैरिफ निर्भर करता है। बतौर इंजीनियर मेरे लिए उस सोर्स को समझना व परखना मेरे लिए बहुत आसान होता था।
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