विशाखापत्तनम में नौसेना की पूर्वी कमान मुख्यालय में तैनात आईएनएस-नीलगिरी। जागरण
अंकुर अग्रवाल, विशाखापत्तनम। हिंद महासागर में बढ़ती गतिविधियों, पूर्वी समुद्री सीमा पर तेज होते सामरिक दबाव व चीन की लगातार गहराती घुसपैठ के बीच भारतीय नौसेना का पूर्वी कमान मुख्यालय विशाखापत्तनम आज देश की समुद्री सुरक्षा की सबसे निर्णायक धुरी बन चुका है।
पिछले दस वर्षों में केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की निर्णयात्मक समुद्री नीति, स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर अभूतपूर्व जोर और आत्मनिर्भर भारत अभियान के चलते यहां नौसेना की शक्ति अप्रत्याशित गति से बढ़ी है। परिणाम यह कि भारतीय समुद्री क्षेत्र की निगरानी अब पहले से कहीं अधिक कठोर, सजग और आक्रामक रूप में की जा रही है।
विशाखापत्तनम से रोजाना होने वाली समुद्र की गश्त, तटीय निगरानी, समुद्री टोही उड़ानें और साइलेंट पनडुब्बी अभियानों की बदौलत पूर्वी तट और बंगाल की खाड़ी पर भारत की सतत निगरानी रहती है।
नौसेना अधिकारियों के अनुसार \“यह ऐसा समुद्री प्रहरी केंद्र है, जहां से किसी भी अवांछित गतिविधि को मिनटों में पकड़ा जा सकता है।\“ यहां तैनात युद्धपोत और पनडुब्बियां भारत की \“पहली प्रतिक्रिया शक्ति’ मानी जाती हैं, जो खतरे का संकेत मिलते ही समुद्र में अदृश्य रूप से सक्रिय हो जाती हैं।
चीन की पनडुब्बियों की संदिग्ध आवाजाही से लेकर हिंद महासागर में अन्य देशों की गतिविधियों तक, हर कदम का जवाब यहीं से तय होता है।
अंडमान-निकोबार दिशा में भारत की बढ़ी हुई उपस्थिति को गति देने में भी यही बेस रीढ़ की हड्डी का काम कर रहा है। समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी इसी कमान पर है, क्योंकि पूर्वी समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की गड़बड़ी सीधे देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार कर सकती है।
इसी कारण विशाखापत्तनम को 24 घंटे हाई-एलर्ट मोड में रखना नौसेना की अनिवार्य प्राथमिकता बन चुका है। चक्रवात, समुद्री दुर्घटना, जहाज संकट या अंतरराष्ट्रीय राहत अभियानों जैसे हर कठिन क्षण में सबसे पहला जवाब यहीं से रवाना होता है।
विशाखापत्तनम है रणनीतिक धुरी
पूर्वी समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा, चीन की बढ़ती गतिविधियों की निगरानी के साथ-साथ अंडमान-निकोबार के जरिए दक्षिण-पूर्वी एशिया तक फैली समुद्री पहुंच, इन तीनों मोर्चों पर एक साथ काम करने वाला भारत का कोई दूसरा नौसैनिक केंद्र नहीं है। इसीलिए विशाखापत्तनम के कदम केवल सुरक्षा से नहीं, बल्कि भारत की आने वाली समुद्री कूटनीति और आर्थिक संरचना से सीधे जुड़े हैं।
पनडुब्बियों और युद्धपोतों की निर्णायक शक्ति
विशाखापत्तनम में नौसेना की सबसे उन्नत पनडुब्बी सुविधाएं मौजूद हैं। ‘साइलेंट मिशन’ भारत को समुद्री गहराइयों में वह रणनीतिक बढ़त देते हैं।
वहीं आधुनिक मिसाइल प्रणालियों से लैस युद्धपोत किसी भी संभावित खतरे को समय रहते ध्वस्त करने में सक्षम हैं। इन्हीं की बदौलत भारत की समुद्री सीमा न सिर्फ सुरक्षित रहती है, बल्कि दुश्मन राष्ट्र को निरंतर संदेश भी देती है कि भारत अब समुद्री शक्ति के रूप में निर्णायक भूमिका में है।
पत्रकारों ने देखा \“उदयगिरी\“ का दमखम
प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआइबी) की उत्तराखंड टीम की ओर से आयोजित विशेष मीडिया आउटरीच कार्यक्रम के तहत देहरादून से विशाखापत्तनम पहुंचे पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने विशाखापत्तनम में नौसेना की परिचालन क्षमता, आधुनिक युद्धपोतों और स्वदेशीकरण आधारित शक्ति को नजदीक से देखा। इस दौरे का उद्देश्य था, नौसेना की वास्तविक सामरिक क्षमता को मीडिया के माध्यम से देश तक पहुंचाना।
दौरे का मुख्य आकर्षण उन्नत स्टील्थ फ्रिगेट आइएनएस-उदयगिरी का विस्तृत आनबोर्ड अवलोकन रहा। यह युद्धपोत प्रोजेक्ट 17ए के तहत तैयार नई पीढ़ी का स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट है, जो कम रडार सिग्नेचर, अत्याधुनिक रडार निगरानी प्रणाली, सतह व आकाश दोनों में लक्ष्य भेदक मिसाइलों, पनडुब्बी रोधी युद्ध प्रणाली और आधुनिक इलेक्ट्रानिक वारफेयर क्षमता से लैस है। नौसेना अधिकारियों ने इसे \“समुद्री आत्मनिर्भरता का प्रतीक\“ बताया।
पोत के कमांडिंग आफिसर कैप्टन विकास सूद ने पत्रकारों को जहाज की परिचालन क्षमता, मिशन तत्परता और हिंद महासागर क्षेत्र की चुनौतियों पर विस्तृत जानकारी दी। रक्षा जनसंपर्क अधिकारी सुजीत रेड्डी और लेफ्टिनेंट कमांडर प्रशांत कुमार ने नौसेना की कार्यप्रणाली और समुद्री हितों की सुरक्षा में इसकी सतत सक्रियता पर प्रकाश डाला।
स्वदेशी शक्ति की नई लहर
भारतीय नौसेना के स्वदेशी स्टील्थ युद्धपोत आइएनएस नीलगिरी और उदयगिरी अत्याधुनिक फ्रिगेट हैं। दोनों जहाजों का निर्माण दो प्रमुख भारतीय शिपयार्डों में अलग-अलग समानांतर रूप से हुआ।
नीलगिरी को मझगांव डाक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (मुंबई) ने बनाया गया, जबकि आइएनएस हिमगिरि गार्डन रीच शिपबिल्डर्स और इंजीनियर्स (कोलकाता) में निर्मित है।
उदयगिरी की कील सात मई 2019 को रखी गई, फिर 17 मई 2022 को इसे समुद्र में उतारा गया और एक जुलाई 2025 को नौसेना को सुपुर्द किया गया। दोनों पोतों को व्यापक परीक्षणों के बाद 26 अगस्त 2025 को विशाखापत्तनम में एक साथ नौसेना में कमीशन किया गया, जो भारतीय नौसेना के इतिहास में दो अग्रिम पंक्ति के सतह युद्धपोतों के एक साथ प्रारंभ होने का प्रथम अवसर माना जाता है।
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