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ऑयल वॉर डुबो देगा वर्ल्ड इकोनॉमी: मिडिल ईस्ट से तनाव, 80% महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल, भारत पर क्या असर?

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मिडिल ईस्ट से तनाव, 80% महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल, भारत पर क्या असर?



नई दिल्ली| मिडिल ईस्ट में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव (Middle East tensions) सिर्फ युद्ध की खबर नहीं है, बल्कि यह दुनिया की अर्थव्यवस्था, खासकर ऑयल मार्केट (oil prices surge) और महंगाई के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। अगर हालात बिगड़ते हैं और तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर (करीब 5,434 रुपए) से उछलकर 108 डॉलर प्रति बैरल (करीब 9,782 रुपए) तक जा सकती है। ऐसा हुआ तो दुनिया भर में महंगाई तेज होगी, ब्याज दरें बढ़ेंगी और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।

1970 के दशक में तेल संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया था। आज हालात थोड़े अलग हैं, लेकिन जोखिम अभी भी जिंदा है। फिलहाल बाजार और केंद्रीय बैंक मिडिल ईस्ट के संघर्ष को \“निगरानी लायक खतरा\“ मान रहे हैं, न कि \“तुरंत आर्थिक आपदा\“। लेकिन अगर तेल के कुएं, रिफाइनरी या समुद्री रास्ते निशाने पर आ गए, तो तस्वीर तेजी से बदल सकती है।
मिडिल ईस्ट क्यों पूरी दुनिया के लिए इतना अहम है?

मिडिल ईस्ट आज भी दुनिया की ऊर्जा की धुरी है। यह क्षेत्र दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग एक-तिहाई और प्राकृतिक गैस का करीब 20% देता है। नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ने के बावजूद वैश्विक ऊर्जा जरूरतों का लगभग 15% हिस्सा अब भी इसी इलाके से आता है।

सिर्फ तेल ही नहीं, यह इलाका वैश्विक पूंजी का भी बड़ा स्रोत है। खाड़ी देशों के सरकारी निवेश फंड दुनिया भर की टेक कंपनियों, रियल एस्टेट, खेल क्लबों और बैंकों में पैसा लगा रहे हैं।

तीसरी अहम चीज है- व्यापारिक रास्ते। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से दुनिया के करीब 20% तेल टैंकर गुजरते हैं। लाल सागर (Red Sea) और स्वेज नहर (Suez Canal) एशिया और यूरोप के बीच व्यापार की लाइफलाइन हैं। यानी यहां तनाव बढ़ा तो असर सिर्फ स्थानीय नहीं, वैश्विक होगा।
ऑयल मार्केट के सामने तीन संभावित रास्ते हैं?

विश्लेषण के मुताबिक, मिडिल ईस्ट का तनाव तीन तरह से तेल बाजार को प्रभावित कर सकता है।

पहला- तनाव बढ़े, लेकिन तेल पर असर न पड़े: कई बार युद्ध होते हैं, लेकिन तेल सप्लाई सुरक्षित रहती है। हाल के संघर्षों में भी ऐसा देखा गया कि मानवीय नुकसान बड़ा था, मगर वैश्विक तेल बाजार लगभग शांत रहा।

दूसरा- तेल की कीमतों में अस्थायी उछाल: यह सबसे संभावित स्थिति मानी जा रही है। अगर ईरान, इराक या खाड़ी क्षेत्र में सीमित सैन्य झड़पें होती हैं, लेकिन तेल सुविधाएं लंबे समय तक प्रभावित नहीं होतीं, तो कीमतें थोड़े समय के लिए तेजी से बढ़ सकती हैं और फिर सामान्य हो सकती हैं।

तीसरा- बड़ा और लंबा तेल झटका: यही सबसे खतरनाक स्थिति है।

अगर खाड़ी देशों की बड़ी तेल सुविधाओं पर हमला होता है या होर्मुज जलडमरूमध्य बंद (Strait of Hormuz risk) हो जाता है, तो दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई रुक सकती है। ऐसी हालत में तेल की कीमत 60 डॉलर से उछलकर 108 डॉलर तक जा सकती है, यानी लगभग 80% की सीधी बढ़ोतरी।
तेल महंगा हुआ तो दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

  • तेल की कीमतों में तेज उछाल सीधे महंगाई को बढ़ाता है, क्योंकि ऊर्जा हर चीज की लागत में शामिल होती है। फैक्ट्री से लेकर ट्रांसपोर्ट तक, सब इसी पर निर्भर है।
  • अमेरिका पर असर सीमित रहेगा, क्योंकि वह अब बड़ा तेल उत्पादक है। फिर भी पेट्रोल महंगा होगा और महंगाई 4% तक जा सकती है। इससे केंद्रीय बैंक को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं।
  • चीन, जो दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है, ज्यादा प्रभावित होगा। महंगा तेल उसकी आर्थिक विकास दर को करीब आधा प्रतिशत तक घटा सकता है और महंगाई बढ़ा सकता है।
  • यूरोप भी ऊर्जा आयात पर निर्भर है। वहां विकास धीमा और महंगाई तेज होने का खतरा रहेगा।
  • भारत जैसे देश, जो तेल आयात पर निर्भर हैं, उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है। ईंधन महंगा, रुपए पर दबाव, महंगाई तेज और चालू खाते का घाटा बढ़ने का जोखिम ज्यादा रहेगा।

तेल की कीमतें इतनी तेजी से क्यों उछलती हैं?

  • इतिहास बताता है कि सप्लाई में 1% की कमी भी कीमतों को 2% से 6% तक बढ़ा सकती है।
  • 2019 में सऊदी तेल सुविधाओं पर हमले से सप्लाई कुछ समय के लिए घटी और कीमतें तुरंत उछल गईं।
  • 2022 में OPEC की उत्पादन कटौती ने भी यही असर दिखाया।
  • यानी बाजार सिर्फ वास्तविक कमी पर ही नहीं, संभावित खतरे पर भी तेजी से प्रतिक्रिया देता है।

कौन फायदे में और कौन रहेगा नुकसान में?

अगर तेल महंगा होता है और सप्लाई बाधित नहीं होती, तो तेल उत्पादक देशों और कंपनियों को फायदा होता है। लेकिन अगर हमला उन्हीं के ढांचे पर हो जाए, तो ऊंची कीमत भी बेकार हो जाती है क्योंकि वे तेल बेच ही नहीं पाते। दूसरी ओर, तेल आयातक देशों, एयरलाइंस, ट्रांसपोर्ट कंपनियों और आम उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ जाता है।
तो क्या आ सकता है बड़ा ऊर्जा संकट?

अभी तक मिडिल ईस्ट के संघर्षों का असर ज्यादा स्थानीय रहा है और वैश्विक तेल सप्लाई सुरक्षित रही है। लेकिन जोखिम बना हुआ है। अगर अगला संघर्ष सीधे तेल के कुओं, पाइपलाइन या समुद्री रास्तों तक पहुंच गया, तो दुनिया को फिर एक बड़े ऊर्जा झटके का सामना करना पड़ सकता है।

फिलहाल बाजार उम्मीद कर रहा है कि तनाव रहेगा, लेकिन तेल की सप्लाई चलती रहेगी। अगर यह संतुलन टूटा, तो महंगा तेल पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी कर सकता है।
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