ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का श्रीमंदिर। फाइल फोटो
संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल। ओडिशा के पुरी में स्थित विश्वविख्यात भगवान जगन्नाथ के श्रीमंदिर के निर्माण इतिहास को लेकर एक अहम और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। हालिया शोध में यह दावा किया गया है कि पुरी श्रीमंदिर के प्रथम निर्माता राजा नहीं, बल्कि ‘पल्ल’ नामक एक शिल्पी थे।
यह जानकारी प्राचीन शिलालेखों और अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर सामने आई है, जिसने अब तक प्रचलित ऐतिहासिक धारणाओं को नई दृष्टि दी है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह महत्वपूर्ण तथ्य नृसिंह मंदिर परिसर के समीप प्राप्त एक प्राचीन शिलालेख से सामने आया है। शिलालेख की शुरुआती पंक्तियों में संस्कृत भाषा में उल्लेख है कि नव पुरुषोत्तम निलय यानी श्रीमंदिर के निर्माण कार्य में ‘कुलपुत्र पल्ल’ की प्रमुख भूमिका थी।
अभिलेख में पल्ल को कर्मकार कुल से संबंधित बताया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वह एक उच्च कोटि के शिल्पी और वास्तुकार थे।
इतिहास में शिल्पी को नहीं मिली थी जगह
अब तक मान्यता रही है कि 12वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा अनंगभीम देव तृतीय ने वर्तमान श्रीमंदिर का निर्माण कराया था। हालांकि, नया शोध यह स्पष्ट करता है कि राजकीय संरक्षण भले ही रहा हो, लेकिन वास्तविक निर्माण योजना, शिल्प और प्रारंभिक ढांचा तैयार करने का श्रेय शिल्पी \“पल्ल\“ को जाता है।
शोधकर्ता दीपक कुमार नायक के अनुसार, यह शिलालेख न केवल श्रीमंदिर के निर्माण काल को समझने में सहायक है, बल्कि उस दौर की शिल्प परंपरा, कर्मकार समाज और मंदिर वास्तुकला पर भी नई रोशनी डालता है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में मंदिर निर्माण केवल राजाओं का कार्य नहीं था, बल्कि कुशल शिल्पियों की पीढ़ियां इसके पीछे होती थीं, जिनका नाम इतिहास में अक्सर दब गया।
इतिहासकारों का मानना है कि यह खोज ओडिशा की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि श्रीमंदिर जैसे भव्य धार्मिक स्थल के निर्माण में स्थानीय शिल्प परंपरा और कर्मकार समुदाय की भूमिका कितनी अहम रही है।
नए तथ्य आ सकते हैं सामने
इस नए खुलासे के बाद श्रीमंदिर के निर्माण इतिहास को लेकर पुनर्मूल्यांकन और आगे के शोध की आवश्यकता महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अन्य अभिलेखों और ताम्रपत्रों का भी गहन अध्ययन किया जाए, तो श्रीमंदिर के इतिहास से जुड़े और कई अनछुए तथ्य सामने आ सकते हैं।
कुल मिलाकर, शिल्पी पल्ल का नाम सामने आना श्रीमंदिर के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ता है और उन गुमनाम कारीगरों को सम्मान देता है, जिनकी कला आज भी आस्था और संस्कृति का केंद्र बनी हुई है। हालांकि इस शोध को मंदिर प्रशासन व जगन्नाथ भक्त व अन्य शोधकर्ताओं द्वारा किस रूप में स्वीकार किया जाता है यह एक बड़ा विषय है।
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