Red Fort Bihar: एक किमी लंबी दीवार के अंदर 85 एकड़ भूखंड। फोटो सौ: राज परिवार
मुकेश कुमार श्रीवास्तव, दरभंगा। Darbhanga Fort: दिल्ली का लाल किला देश की पहचान है, लेकिन मिथिला की धरती पर खड़ा दरभंगा का राज किला अपनी ऊंचाई और इतिहास में दिल्ली से कम नहीं, बल्कि कई मायनों में उससे आगे है। यमुना की ओर दिल्ली के लाल किले की दीवार जहां करीब 60 फीट ऊंची है, वहीं दरभंगा राज किले की दीवारें चारों दिशाओं में एक समान करीब 90 फीट ऊंचाई तक खड़ी हैं।
यह ऊंचाई सिर्फ ईंट-पत्थर की नहीं, बल्कि दरभंगा राज परिवार के वैभव, दूरदृष्टि और सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक है। महाधिरानी के निधन के बाद यह किला एक बार फिर चर्चा में है।एक ऐसी धरोहर के रूप में, जो बीते दौर की शान, आस्था और सत्ता तीनों की कहानी कहती है।
आजादी की दहलीज पर खड़ा निर्माण
वर्ष 1934 के विनाशकारी भूकंप के बाद और 1940 के दशक में जब आजादी की लड़ाई अपने अंतिम चरण में थी तब दरभंगा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह ने इस विशाल किले के निर्माण की योजना बनाई। ब्रिटिश फर्म के ठेकेदार बैक कैगटोम को इसका निर्माण का जिम्मा सौंपा गया।
पूर्व, उत्तर और दक्षिण दिशा की दीवारें पूरी कर ली गईं, लेकिन पश्चिमी दीवार कुछ दूरी तक जाकर अधूरी रह गई। इतिहासकार इसके पीछे अलग-अलग तर्क देते हैं। कुछ का कहना है कि एक प्रभावशाली परिवार के घर में सूर्य प्रकाश बाधित होने को लेकर आए न्यायिक आदेश के बाद निर्माण रोकना पड़ा।
कुछ मानते हैं कि देश की आजादी लगभग तय हो चुकी थी, इसलिए राजशाही भविष्य को देखते हुए निर्माण को रोक दिया गया। कारण जो भी रहा हो, अधूरा रह गया यह किला आज भी अपनी भव्यता में पूरा दिखता है।
आस्था का अभेद्य दुर्ग
राज धरोहर की शोधार्थी कुमुद सिंह कहती हैं कि किला निर्माण के पीछे महाराज की दो सोच थी। पहली, आजादी नहीं मिलने की स्थिति में किला के बदौलत रूलिंग स्टेट का दर्जा मिल जाता। दूसरी, देश आजाद हो जाता है तो कुल देवी-देवताओं का स्थान सुरक्षित हो जाता।
इसी उद्देश्य के तहत महाराजाधिराज ने 85 एकड़ वाले रामबाग की न सिर्फ घेराबंदी कराई वरन परिसर के अंदर कंकाली मंदिर, राधे-कृष्ण, लक्ष्मी, दुर्गा, गौड़ी सहित 11 देवी-देवताओं के स्थान को सुरक्षित कर लिया। इस परिसर में महाराज का आवास या सचिवालय तो नहीं था, लेकिन महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की मृत्यु होने के कारण महारानी लक्ष्मी वत्ती व महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली पत्नी राजलक्ष्मी पूजा-अर्चना करने के लिए इसी परिसर में निवास करती थीं।
85 एकड़ का सुरक्षित संसार
दरभंगा राज किले की दीवार करीब एक किलोमीटर लंबी है। इसके भीतर 85 एकड़ में फैला रामबाग परिसर है, जिसे पूरी तरह घेराबंदी कर सुरक्षित किया गया। दीवारों के ऊपरी हिस्से में वॉच टावर और गार्ड हाउस बनाए गए, जबकि मुख्य प्रवेश द्वार को ‘सिंह द्वार’ कहा गया।
लाल ईंटों से बनी दीवारों पर दुर्लभ वास्तुकला की छाप साफ दिखाई देती है। किले के भीतर चारों ओर बनाई गई खाई झील जैसी अनुभूति देती है, जो कभी सुरक्षा का हिस्सा थी। साथ ही राज परिवार का दुर्लभ कंकाली मंदिर भी इसी किले के अंदर है।
निवास नहीं, स्मृति का स्थान
इस विशाल परिसर में न तो महाराज का आवास था और न ही कोई सचिवालय। लेकिन महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह का निधन इसी रामबाग परिसर में हुआ था। इसके बाद महारानी लक्ष्मीवत्ती और महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली पत्नी राज लक्ष्मी पूजा-अर्चना के लिए यहीं निवास करती थीं। यह स्थान उनके लिए सत्ता से अधिक स्मृति और साधना का केंद्र था।
किले के लिए उजड़ा गांव
किले के निर्माण से पहले यह क्षेत्र इस्लामपुर गांव का हिस्सा था, जो कभी मुर्शिदाबाद के नवाब अलीवर्दी खान के नियंत्रण में था। बाद में यह दरभंगा महाराज के अधीन आ गया था। किले के निर्माण के लिए यहां की आबादी को मुआवजा देकर शिवधारा, अलीनगर, लहेरियासराय, चकदोहरा जैसे इलाकों में बसाया गया। एक किले ने कई मोहल्लों को जन्म दिया। यह भी इसके इतिहास का अनकहा पक्ष है।
संरक्षण की लड़ाई
दिल्ली के लाल किले की तरह दरभंगा के इस राज किले को भी संरक्षित करने की मांग दशकों से उठती रही है, लेकिन ठोस पहल अब तक नहीं हो सकी। भारतीय पुरातत्व विभाग ने 1977-78 में इसका सर्वे जरूर कराया, पर आगे बात नहीं बढ़ी।
हालांकि अब दरभंगा राज के अंतिम महाराज बहादुर सर कामेश्वर सिंह के पौत्र कुमार कपिलेश्वर सिंह ने किले के संरक्षण और उसकी खोई गरिमा लौटाने की पहल शुरू की है। निजी स्तर पर काफी काम हुआ है, लेकिन सरकारी संरक्षण की बाट यह धरोहर आज भी देख रही है।
राज परिवार से ही पहल
अब दरभंगा राज के अंतिम महाराजा बहादुर सर कामेश्वर सिंह के पोते, कुमार कपिलेश्वर सिंह, ने इस ऐतिहासिक राज किला के संरक्षण और उसकी खोई हुई गरिमा को वापस लाने की पहल शुरू कर दी है। इस दिशा में काफी हद तक सफलता मिली है, लेकिन, सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है।
दरभंगा का राज किला केवल ईंटों का ढांचा नहीं, बल्कि मिथिला के गौरव, आस्था और इतिहास की जीवित स्मृति है। महाधिरानी के निधन के बाद यह किला एक बार फिर याद दिलाता है कि राजशाही भले इतिहास बन गई हो, लेकिन उसकी छाया आज भी दरभंगा की लाल दीवारों पर उतनी ही ऊंची खड़ी है- जितनी कभी थी। |