परिवहन विभाग की ओर से ऑटो पर हेलमेट नहीं पहनने के आरोप में भेजे गए ई-चालान काटे दिखाते पीडि़त व्यक्ति।
जागरण संसू, अनुगुल। डिजिटल इंडिया के दौर में ओडिशा परिवहन विभाग का ई-चालान सिस्टम (E-Challan System) असुविधा का सबब बन गया है। जिस पारदर्शी व्यवस्था का दावा करके इसे लागू किया गया था, वह अब अपनी गंभीर तकनीकी खामियों और \“प्रशासनिक संवेदनहीनता\“ के कारण चर्चा में है। राज्य के विभिन्न जिलों से ऐसे हैरान करने वाले मामले आए हैं, जहां तीन पहिया ऑटो, छह पहिया ट्रक और यात्री बसों पर भी \“बिना हेलमेट\“ वाहन चलाने का जुर्माना ठोक दिया गया है।
केस स्टडी: जब ऑटो और ट्रक बन गए \“दोपहिया\“ विभाग की इस डिजिटल लापरवाही की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। भद्रक जिले के रामकृष्ण नाथ का मामला सबसे पहले वायरल हुआ, जब उनके ऑटो पर हेलमेट न पहनने का चालान काटा गया। इसके बाद नयागढ़ के महेश्वर बेहेरा का दर्द सामने आया। महेश्वर पिछले 12 वर्षों से भुवनेश्वर में ऑटो चलाकर परिवार पाल रहे हैं, लेकिन उन्हें सूचना मिली कि गंजाम जिले में \“बिना हेलमेट\“ बाइक चलाने पर उन पर 1500 रुपये का जुर्माना लगा है। महेश्वर का कहना है कि उस समय वे वहां मौजूद भी नहीं थे। हैरानी की सीमा तब पार हो गई जब गंजाम जिले के प्रमोद कुमार स्वांई के छह पहिया ट्रक को दोपहिया वाहन मानकर चालान काट दिया गया। यहां तक कि कटक में एक यात्री बस के चालक को भी इसी \“डिजिटल त्रुटि\“ के कारण जुर्माने का सामना करना पड़ा।
क्यों फेल हो रही है तकनीक?
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के अनुसार, इस डिजिटल अराजकता के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं:
- ANPR कैमरों की विफलता: स्वचालित नंबर प्लेट पहचान कैमरे (ANPR) धूल, कोहरे या गलत एंगल की वजह से नंबरों को सही से नहीं पढ़ पाते। उदाहरण के लिए, \“8\“ को \“0\“ या \“3\“पढ़ लेने से किसी निर्दोष के घर ई-चालान पहुंच जाता है।
- सॉफ्टवेयर की नासमझी: सिस्टम वाहनों की श्रेणी (Category) पहचानने में फेल हो रहा है। वह नंबर प्लेट के आधार पर ऑटो और ट्रक को भी बाइक की श्रेणी में डाल देता है।
- मानवीय सत्यापन का अभाव:नियमतः चालान जारी होने से पहले आरटीओ (RTO) स्तर पर फोटो की जांच होनी चाहिए। लेकिन बिना मैन्युअल क्रॉस-चेक किए थोक के भाव में चालान स्वीकार किए जा रहे हैं।
गरीबों पर दोहरी मार: जुर्माना भी और चक्कर भी
यह समस्या केवल 1000-1500 रुपये के जुर्माने तक सीमित नहीं है। परिवहन विभाग के नियम इतने कड़े हैं कि जब तक जुर्माना जमा नहीं किया जाता, तब तक वाहन का परमिट, फिटनेस सर्टिफिकेट और बीमा रिन्यू नहीं हो सकता। एक गरीब ऑटो चालक के लिए 1500 रुपये उसकी कई दिनों की कमाई के बराबर होते हैं। गलत चालान को सुधरवाने के लिए उसे क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों (RTO) के चक्कर काटने पड़ते हैं, जिससे उसकी दिहाड़ी का नुकसान होता है। कई बार हारकर लोग मानसिक तनाव से बचने के लिए गलत जुर्माना ही भर दे रहे हैं। ओडिशा में हो रहे ये \“फर्जी चालान\“ केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि जवाबदेही की कमी को भी दर्शाते हैं।
जिला परिवहन विभाग से लोगों की प्रमुख मांगें
- विभाग तत्काल ई-चालान प्रणाली की समीक्षा करे।
- जो चालान स्पष्ट रूप से गलत श्रेणी (जैसे ट्रक पर हेलमेट) के हैं, उन्हें स्वतः (Sua Sponte) निरस्त किया जाए।
- गलत चालान जारी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
- तकनीक के साथ-साथ \“मानवीय दिमाग\“ का भी इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए।
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