किश्तवाड़ में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान कपकोट के वीर सपूत हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
जागरण संवाददाता, बागेश्वर। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान कपकोट के वीर सपूत हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया ने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया। 43 वर्षीय गजेंद्र सिंह गढ़िया, पुत्र धन सिंह गढ़िया, भारतीय सेना की टू-पैरा कमांडो यूनिट में तैनात थे।
18 जनवरी को श्रीपुरा क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में उनकी वीरगति की सूचना मिलते ही तहसील कपकोट के ग्राम गैंनाड़ (बीथी) में शोक की लहर दौड़ गई। हर आंख नम है और हर दिल अपने वीर बेटे पर गर्व के साथ गम से भरा हुआ है।
बलिदानी गजेंद्र सिंह गढ़िया परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। घर की माली हालत पहले से ही ठीक नहीं थी। माता-पिता खेती-किसानी से जीवनयापन करते हैं, जबकि छोटा भाई एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक है, जहां से मिलने वाला मानदेय परिवार की जरूरतों के लिए नाकाफी है।
बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए पत्नी लीला गढ़िया देहरादून में किराये के मकान में रह रही थीं। उनके दोनों पुत्र राहुल और धीरज कक्षा चार में पढ़ते हैं, जिन्हें अब पिता का साया हमेशा के लिए खोना पड़ा है।
20 जनवरी को पहुंचेगा पार्थिव शरीर, सैन्य सम्मान के होगी अंतिम विदाई
देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए बलिदान हुए वीर सपूत गजेंद्र सिंह गढ़िया का पार्थिव शरीर 20 जनवरी को हेलीकाप्टर से केदारेश्वर मैदान लाया जाएगा।
वहां से स्व. चंद्र सिंह शाही राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कपकोट के खेल मैदान तक अंतिम यात्रा निकलेगी। यहीं ग्रामीणों और स्वजनों को अंतिम दर्शन का अवसर मिलेगा। कौसानी सिग्नल के जवान सैन्य सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई देंगे।
देहरादून से कपकोट पहुंचा शहीद का परिवार, पत्नी बेसुध
बलिदानी गजेंद्र की पत्नी लीला गढ़िया तथ दोनों पुत्र हेलीकाप्टर से गरुड़ के मेलाडुंगरी हेलीपैड पहुंचे, जहां से टैक्सी द्वारा कपकोट लाया गया। स्वजन के अनुसार पत्नी बार-बार बेसुध हो रही हैं। मासूम बच्चे पिता को याद कर उनसे लिपटकर फूट-फूट कर रो रहे हैं। गांव का माहौल पूरी तरह गमगीन है, हर घर में शोक और सन्नाटा पसरा है।
2004 में थामा था देश सेवा का मार्ग
हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया वर्ष 2004 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। पैरा (स्पेशल फोर्स) जैसी कठिन और जोखिम भरी यूनिट में रहते हुए उन्होंने वर्षों तक अदम्य साहस, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा का परिचय दिया। उनके बलिदान पर पूरे जनपद को गर्व है, लेकिन इस वीरता की कीमत उनके परिवार ने अपूरणीय क्षति के रूप में चुकाई है।
दुर्गम गांव, टूटी सड़कें तथा अंतिम संस्कार की विवशता
बलिदानी का गांव गैंनाड़ (बीथी) आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इंटरनेट सुविधा नहीं है, चारों ओर बांज तथा फल्यांट का जंगल और जंगली जानवरों का भय बना रहता है।
- सड़क काटी जा रही है। गांव तक पहुंचने के लिए तीन किमी पैदल भी चलना पड़ता है।
- इसी कारण बलिदानी का पार्थिव शरीर गांव नहीं ले जाया जा सकेगा।
- ग्रामीणों के अनुसार कपकोट में ही अंतिम दर्शन के बाद सरयू-खीरगंगा संगम पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
वीरता की अमर गाथा
सामाजिक कार्यकर्ता दीपक गढ़िया ने कहा कि गजेंद्र सिंह गढ़िया ने अपने बलिदान से न केवल अपने गांव और क्षेत्र, बल्कि पूरे देश का मान बढ़ाया है। उनका नाम हमेशा वीरों की गाथाओं में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। देश ने एक सच्चा सपूत खोया है, और गैंनाड़ गांव ने अपना वह बेटा, जो हर सांस देश के नाम कर गया।
यह भी पढ़ें- गढ़वाल राइफल्स के हवलदार रविन्द्र सिंह राणा ने दिया सर्वोच्च बलिदान, अरुणाचल प्रदेश के अलोंग में थे तैनात
यह भी पढ़ें- Dehradun News: 72 घंटे अकेले ही चीनी फौज से लड़ा यह योद्धा, पुण्यतिथि पर बलिदानी जसवंत सिंह रावत को किया नमन |
|