जमीन की जमाबंदी पुरखों के नाम, किसान आज भी पहचान से वंचित
दिलीप ओझा, शाहपुर (आरा)। यूं तो बाप व दादा के नाम से समाज मे लोगों का कद बढ़ता है, लेकिन अब यही नाम किसान आईडी बनाने में लोगों के आड़े आ रहा है, क्योंकि अंचल क्षेत्र के सभी मौजों के नब्बे प्रतिशत जमीन की जमाबंदी रैयत जिन लोगों के नाम पर है उनकी दूसरी, तीसरी पीढ़ी के लोगों को किसान आईडी बनानी है।
रैयतों के नाम पर जमाबंदी नही होने के कारण किसानों का किसान आईडी नही बन पा रहा है। जमीन का सर्वे वर्ष 1971-72 में हुआ है। उस समय जिन रैयतों के नाम से जमाबंदी दर्ज की गई थी। उनमें से करीब 70 से 80 प्रतिशत रैयतों की मौत हो चुकी हैं।
इस बीच जमीन की खरीद व बिक्री भी हुई। परंतु ऐसे जमाबंदी रैयतों की भी मौत हो चुकी हैं। हालांकि की ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन की खरीद बिक्री बहुत ही कम मात्रा में है। इससे इतर शहरी व शहरी क्षेत्रों के आसपास के राजस्व ग्रामों में जमीन की खरीद बिक्री बड़े पैमाने पर हुई है, लेकिन इस तरह की खरीद बिक्री मकान, दुकान या फिर व्यवसाय के लिए ही हुई है।
ऐसे में इस तरह के रैयतों का किसान आईडी नही के बराबर बन रहे हैं। अंचल क्षेत्र का शाहपुर, खुटहा, रमदतही, प्रसौन्ड़ा, सोनवर्षा, बिलौटी, सहजौली, भरौली, गौरा, कारजा, बेलवनिया मौजे का लगभग शहरीकरण हो गया। जबकि शाहपुर पूर्ण रूपS के शहरी क्षेत्र बन गया है।
वहीं, 1971 के सर्वे से लेकर अभी करीब 55 वर्षों में करीब दस हजार एकड़ क्षेत्रफल में मकान, सड़क, नाले, बांध व छोटे मोटे कल कारखाने सहित कई तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर खड़े हो गए। जिसके कारण कृषि क्षेत्र के रैयतों की संख्या घट गई।
किसान आईडी बनाने में लगे अधिकारियों व कर्मियों के अनुसार किसानों के अपने नाम पर जमीन का जमाबंदी का नही हो सबसे ज्यादा परेशानी खड़ा कर रहा है। ऐसे में सौ दिन चले ढाई कोस वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यानी मेहनत अधिक और काम का नही होना हैं।
शाहपुर अंचलाधिकारी आनंद प्रकाश के अनुसार अंचल क्षेत्र में महज दस प्रतिशत जमाबंदी ही रैयतों के नाम पर है। जबकि शेष जमाबंदी परदादा, दादा व पिता के नाम पर ही दर्ज हैं। |