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संधियां राष्ट्रीय हित से प्रेरित होनी चाहिए न कि विदेशी सरकारों के दबाव से: सुप्रीम कोर्ट

Chikheang 1 hour(s) ago views 1027
  

सुप्रीम कोर्ट।  



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत द्वारा की गई संधियां हमेशा राष्ट्रीय हित से प्रेरित होनी चाहिए, न कि विदेशी सरकारों या निगमों के दबाव से। कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत को अंतरराष्ट्रीय कर समझौतों में अपनी कर संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इनका दुरुपयोग न हो।

जस्टिस जेबी पारदीवाला की ये टिप्पणियां उस फैसले के दौरान आईं जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू राजस्व अधिकारियों के उस निर्णय को बरकरार रखा कि 2018 में फ्लिपकार्ट से अमेरिकी निवेशक फर्म टाइगर ग्लोबल के बाहर निकलने से उत्पन्न पूंजीगत लाभ भारत में कर योग्य हैं। जस्टिस पारदीवाला ने एक अलग लेकिन सहमतिपूर्ण राय लिखी, जिसमें इस बात पर व्यापक सिद्धांत स्पष्ट किए गए कि भारत को अंतरराष्ट्रीय कर संधियों के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

जस्टिस पारदीवाला ने कहा, \“\“कर संधियां, अंतरराष्ट्रीय समझौते, प्रोटोकाल और सुरक्षा उपाय अत्यंत पारदर्शी और आवधिक समीक्षा के योग्य होने चाहिए, जिनमें अनुचित परिणामों से बचने, राष्ट्र की रणनीतिक और सुरक्षा की रक्षा करने, कर आधार के क्षरण और लोकतांत्रिक नियंत्रण के नुकसान या कमजोर होने को रोकने और संप्रभु के कराधान के अधिकार की रक्षा के लिए स्पष्ट अपवादों को शामिल करने के लिए मजबूत निकास खंडों के साथ पुनर्विचार करने की शक्ति हो।\“\“

उन्होंने कहा, \“\“संधियां राष्ट्रीय हित से प्रेरित होनी चाहिए, न कि विदेशी सरकारों या निगमों के दबाव से।\“\“\“ सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत सुरक्षा उपाय निर्धारित किए हैं कि कर संधियां देश की आर्थिक संप्रभुता, राजस्व आधार और सार्वजनिक हित की रक्षा करें।

जस्टिस पारदीवाला ने कुछ सुरक्षा उपाय सुझाए जिसे भारत को अंतरराष्ट्रीय कर संधियों पर बातचीत या नवीनीकरण करते समय अपनाना चाहिए, जिसमें शेल कंपनियों द्वारा लाभों की सीमा संबंधी खंडों को शामिल करना, सामान्य कर-बचाव विरोधी नियम जैसे घरेलू कर-बचाव विरोधी कानूनों की अनुमति देना शामिल है।

उन्होंने कहा कि संधियों में केवल नौकरशाही या राजनयिक लक्ष्यों को ही नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक और सार्वजनिक हितों को भी प्रतिबिंबित करना चाहिए। गौरतलब है कि टाइगर ग्लोबल ने 2018 में फ्लिपकार्ट से अपना कारोबार समेट लिया, जब वालमार्ट इंक ने भारतीय ई-कॉमर्स कंपनी में नियंत्रक हिस्सेदारी हासिल कर ली थी। टाइगर ग्लोबल ने इस मामले पर फैसला सुनाने के लिए फरवरी, 2019 में आयकर विभाग से अग्रिम प्राधिकरण के आदेश के लिए संपर्क किया था।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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