नफरत और प्यार का रिश्ता बहुत सुना गया होगा लेकिन चीन के साथ भारत का रिश्ता नफरत और जरुरत का है। चीन से नफरत भी है और उसकी जरुरत भी है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने राहुल गांधी के चीन के राजदूत से मिलने की घटना को आसमान टूट पड़ने जैसी घटना माना था। उसके लिए पूरी कांग्रेस पार्टी को देशद्रोही ठहराया गया। कांग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीसी के साथ एक एमओयू साइन हुआ था, जिसे लेकर भाजपा ने बड़ा नैरेटिव खड़ा किया। लेकिन अब खुद भाजपा नेता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल से मिले हैं। भाजपा के विदेश प्रकोष्ठ के अध्यक्ष विजय चौथाईवाला ने यह मुलाकात तय कराई और पार्टी मुख्यालय में महासचिव अरुण सिंह के साथ दूसरे नेता सीपीसी के प्रतिनिधिमंडल से मिले।

भाजपा के नेता यह कह कर फेस सेविंग कर रहे हैं कि चीन के डेलिगेशन से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा या कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन नहीं मिले या पार्टी के दोनों सर्वोच्च नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मुलाकात नहीं की, जबकि कांग्रेस में खुद राहुल गांधी मिले थे। लेकिन यह बचाव का तर्क नही हो सकता है। जैसे ही भाजपा नेताओं से सीपीसी डिलेगेशन के मिलने की तस्वीरें सामने आईं वैसे ही सन्नाटा खींच गया। सोशल मीडिया में भाजपा का पूरा इकोसिस्टम खामोश हो गया। इस बीच दो चार लोगों ने हिम्मत करके सवाल उठाया और दबी जुबान में कहा कि यह अच्छा नहीं हुआ। भाजपा नेताओं से मुलाकात के बाद सीपीसी का डेलिगेशन आरएसएस कार्यालय में संघ के नंबर दो पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबाले से मिला। हालांकि उसकी फोटो नहीं जारी की गई। बाद में भारत की तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों से सीपीसी के प्रतिनिधिमंडल के मिलने की खबर भी आई।
अब सवाल है कि जिस समय चीन अरुणाचल प्रदेश में जन्मे भारतीय मूल के लोगों को अपने हवाईअड्डों पर रोक कर पासपोर्ट अवैध बता रहा है या अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग बताने वाले यूट्यूबर्स को रोक कर प्रताड़ित कर रहा है, शक्सगाम घाटी में निर्माण कार्य कर रहा है और उसे चीन का हिस्सा बता रहा है उसके प्रतिनिधिमंडल के साथ भाजपा की दोस्ती दिखाने का क्या मतलब है? सरकारी स्तर पर दोनों देशों के बीच संबंध सुधर गए हैं। मोदी और शाह ने व्यापार की खातिर गलवान घाटी में शहीद हुए 20 जवानों का घाव भुला दिए है। प्रधानमंत्री मोदी की बहुपक्षीय मंचों पर शी जिनपिंग से मुलाकात हुई है तो भारत के रक्षा और विदेश मंत्री दोनों ने चीन का दौरा किया है। लेकिन पार्टी टू पार्टी यानी भाजपा और सीपीसी के नेताओं की मुलाकात या संघ और सीपीसी की मुलाकात का क्या मतलब है?
कहा जा रहा है कि एक दूसरे की कार्यप्रणाली को समझने की कोशिश इस मुलाकात का मकसद थी। जाहिर है कि चीन को भारत से लोकतांत्रिक प्रणाली सीखने में कोई दिलचस्प नहीं होगी तो क्या भारतीय जनता पार्टी यह सीखने की कोशिश कर रही थी कि भारत में भी कैसे चीन की तरह एकदलीय व्यवस्था लागू हो सकती है? चीन की कम्युनिस्ट पार्टी इसके अलावा भाजपा या किसी भी पार्टी को और क्या सीखा सकती है? वहां एकदलीय व्यवस्था है। कम्युनिस्ट पार्टी ही सरकार है और सरकारी ही पार्टी है। दूसरी बात यह है कि कोई भी नेता पार्टी और सरकार के खिलाफ नहीं बोल सकता है। सर्वोच्च नेता शी जिनपिंग हैं और उनकी हर बात का समर्थन करना सिर्फ पार्टी के नेताओं का ही नहीं, बल्कि चीन की जनता का भी पुनीत कर्तव्य है। भारत में भी पार्टी और सरकार को तो एक कर दिया गया है और यहां भी मोदी और शाह के खिलाफ बोलने को देशद्रोह माना जाने लगा है लेकिन एक बाधा विपक्ष की है। विपक्ष अब भी मजबूत है और उसके नेता भाजपा को जवाबदेह बनाने की कोशिश करते रहते हैं। तभी हो सकता है कि सीपीसी से भाजापा ने इस मामले में कुछ टिप्स लिए हों।
इस मुलाकात के कारणों पर विचार करने पर ऐसा लगता है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से मिलने की मजबूरी भी हो सकती है। असल में भारत लगभग पूरी तरह से चीन पर आश्रित हो गया है। रोजमर्रा की जरुरत की चीजों से लेकर कृषि सेक्टर के उपकरणों, सेमीकंडक्टर सहित ऑटोमोबाइल सेक्टर के दूसरे कंपोनेंट, आईटी सेक्टर के उपकरण, दवाओं के लिए जरूरी कंपोनेंट आदि सब चीन से आता है। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 116 अरब डॉलर यानी 15 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया है। फिर भी चीन के साथ कारोबार करने की मजबूरी है। यह मजबूरी कैसी है इसे इस एक तथ्य से समझें कि भारत ने चीन के मांझे पर रोक लगाई है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के राज्य गुजरात में मकर संक्रांति पर पतंगोत्सव के दौरान चीनी मांझे से गला कटने की वजह से नौ लोगों की मौत हो गई। सोचें, जिस पर पाबंदी है वह माल भी चीन से आ रहा है और खुलेआम भारत में बिक रहा है। अगर चीनी मांझे से गला कटने से होने वाली मौतों का देश भर का आंकड़े देखें तो गुजरात से वाराणसी तक मरने वालों की संख्या और बड़ी हो जाएगी। बहरहाल, भारत की मजबूरी है कि वह चीन के साथ अच्छे संबंध रखे अन्यथा वह रेयर अर्थ मैटेरियल देना बंद कर देगा तो भारत क्या करेगा? हो सकता है कि मुलाकात इस मजबूरी में हुई हो।
लेकिन इस मजबूरी की मुलाकात को एक दूसरा रुप भी दिया जा सकता है। इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि भारत ने अमेरिका को मैसेज देने के लिए चीन के प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात भाजपा और संघ के नेताओं से कराई। ध्यान रहे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात पर चिंता जता चुके हैं कि वे रूस और चीन के हाथों भारत को गंवा चुके हैं। इस धारणा को बदलने या ठीक करने के लिए ही भारत में नियुक्त राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि अमेरिका के लिए भारत से जरूरी कोई नहीं है। लेकिन जिस दिन गोर ने यह बात कही उसी दिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से भाजपा नेताओं की मुलाकात की तस्वीरें आईं।
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