20 दिन, अनगिनत सवाल और रहस्यमयी चुप्पी, सच से क्यों डर रहा रेल प्रशासन?
संवाद सूत्र, सिमुलतला (जमुई)। वक्त के साथ जख्म भरने चाहिए, लेकिन जब बात सिस्टम की नाकामी और हजारों जिंदगियों की सुरक्षा की हो तो वक्त का गुजरना सवालों को और गहरा कर देता है। सिमुलतला रेल हादसे को बीते आज पूरे 20 दिन हो चुके हैं, लेकिन दुर्घटना की जांच के लिए गठित चार सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट का अता-पता नहीं है।
यह केवल एक रिपोर्ट में देरी नहीं, बल्कि पारदर्शिता की हत्या और आम जनता के जानने के अधिकार के साथ किया गया एक क्रूर मजाक है। इस पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू रेलवे के जिम्मेदार अधिकारियों का रवैया रहा है।
बीते 20 दिनों में सीपीआरओ कोलकाता शिवराम मांझी से दर्जनों बार इस बाबत संपर्क साधा गया, लेकिन हर बार वही घिसा-पिटा जवाब, अभी रिपोर्ट नहीं आई है। आखिर ऐसा क्या है उस रिपोर्ट में जिसे बाहर आने से रोका जा रहा है? क्या रिपोर्ट वाकई तैयार नहीं है, या फिर फाइलों में लीपापोती का खेल चल रहा है?
अधिकारियों की चुप्पी संवेदनशीलता या साजिश?
घटना के वक्त जीएम और डीआरएम मौके पर डटे रहे, लेकिन उन्होंने मीडिया के कैमरों और माइक से ऐसी दूरी बनाए रखा मानो कोई बड़ा राज छुपाना हो। दुर्घटना के बाद दो दिनों तक एडीआरएम ने मौके पर रहकर कार्य तो अंजाम दिया, लेकिन मीडिया कर्मियों से बात करने की जहमत उन्होंने भी नहीं उठाई।
हद तो तब हो गई जब सीआरएस निरीक्षण के दौरान स्थानीय मीडिया को मामले की गंभीरता का हवाला देकर दूर खदेड़ दिया गया। सवाल उठता है कि अगर मामला गंभीर था तो क्या उस गंभीरता की वास्तविकता जनता तक पहुंचाना गुनाह है?
तबादलों का खेल और शक की सुई
इस चुप्पी के पीछे की कहानी तब और पेचीदा हो जाती है, जब हम निवर्तमान डीआरएम विनीता श्रीवास्तव के तबादले पर गौर करते हैं। उनका कैट कोलकाता में अर्जी देना और बाद में मुरादाबाद का डीआरएम बनाया जाना, क्या यह सब महज संयोग है या फिर मामले का पटाक्षेप करने की कोई सुनियोजित रणनीति? प्रशासन की यह गतिविधियां संदेह के बादलों को और घना कर रही हैं।
चौथे स्तंभ के साथ भद्दा मजाक
लोकतंत्र में मीडिया केवल खबर नहीं पहुंचाता। वह शासन और जनता के बीच का सेतु होता है। जब हादसा हुआ तो यही मीडिया कर्मी तत्क्षण मौके पर पहुंचे और अपनी जान जोखिम में डालकर पल-पल की अपडेट दुनिया को दी, लेकिन आज जब जवाबदेही तय करने का वक्त आया है तो पूर्व रेलवे के अधिकारी मीडिया से मुंह चुरा रहे हैं।
यह केवल मीडिया की स्वतंत्रता का हनन नहीं है, बल्कि उस आम यात्री के विश्वास के साथ धोखा है जो रेलवे पर भरोसा करके सफर करता है। अगर हादसे की असली वजह और रिपोर्ट मीडिया से छिपाई जाएगी तो सुधार की गुंजाइश कैसे बनेगी? रेल प्रशासन को याद रखना चाहिए कि सच को ज्यादा देर तक फाइलों में कैद नहीं रखा जा सकता। जनता जवाब मांग रही है, आखिर रिपोर्ट कहां है? |
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