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आदित्य साहू की जवाबदेही बढ़ने के साथ चुनौतियां भी, संगठन को धार देने और सामाजिक संतुलन की बड़ी परीक्षा

Chikheang 1 hour(s) ago views 852
  

आदित्य साहू के कंधों पर पार्टी को नई धार देने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।



प्रदीप सिंह, रांची। भारतीय जनता पार्टी के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए आदित्य साहू का चयन तय है। ऐसे समय में जब झारखंड में भाजपा सत्ता से बाहर है और संगठनात्मक स्तर पर पुनर्गठन की जरूरत महसूस की जा रही है, आदित्य साहू के कंधों पर पार्टी को नई धार देने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।

झारखंड भाजपा इस समय कई स्तरों पर चुनौतियों से जूझ रही है। राज्य की राजनीति में आदिवासी समुदाय की निर्णायक भूमिका रही है, जहां झामुमो का पारंपरिक प्रभाव मजबूत है। इसके अलावा कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के साथ बना विपक्षी गठबंधन भाजपा के लिए निरंतर दबाव का कारण बना हुआ है।

2019 के बाद हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जिससे कार्यकर्ताओं में भी एक हद तक निराशा देखी गई। ऐसे में नए प्रदेश अध्यक्ष से संगठन को फिर से सक्रिय और आक्रामक बनाने की अपेक्षा की जा रही है।

आदित्य साहू को एक संगठनात्मक नेता के रूप में देखा जाता है। वे लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे हैं और पार्टी के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं।

वे झारखंड भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका में भी रहे, जहां संगठनात्मक चुनाव, बूथ सशक्तिकरण और कार्यकर्ता संवाद जैसे कार्यों में उनकी सक्रियता सामने आई।

राज्यसभा सदस्य के रूप में उनका अनुभव उन्हें राष्ट्रीय राजनीति की समझ भी देता है, जिसका लाभ प्रदेश संगठन को मिल सकता है।
संतुलित और अविवादित छवि

आदित्य साहू की एक बड़ी सकारात्मक विशेषता उनका जमीनी जुड़ाव माना जाता है। वे जिला और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ नियमित संवाद रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं।

इससे संगठन में विश्वास और अनुशासन बनाए रखने में मदद मिलती है। इसके साथ ही, उन्हें अपेक्षाकृत संतुलित और विवादों से दूर रहने वाला नेता माना जाता है, जो अंदरूनी गुटबाजी से जूझ रही झारखंड भाजपा के लिए अहम साबित हो सकता है।
सामाजिक समीकरण के लिहाज से चयन महत्वपूर्ण

सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी आदित्य साहू का चयन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा झारखंड में आदिवासी, ओबीसी, वैश्य और शहरी मतदाताओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश में है।

आदित्य साहू की पृष्ठभूमि और संगठनात्मक छवि इसी रणनीति के अनुरूप है। हालांकि, आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, जहां केवल संगठन नहीं, बल्कि संवेदनशील राजनीतिक संवाद की भी जरूरत है।

कुल मिलाकर आदित्य साहू का प्रदेश अध्यक्ष बनना भाजपा के लिए केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि संगठनात्मक पुनर्निर्माण का संकेत है।

यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वे चुनावी राजनीति, सामाजिक समीकरण और कार्यकर्ताओं के मनोबल यानि तीनों मोर्चों पर पार्टी को कितनी प्रभावी दिशा दे पाते हैं? झारखंड जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक तानाबाना वाले राज्य में उनकी सफलता ही भाजपा के भविष्य की राह तय करेगी।
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