प्रोलय चाकी को 16 दिसंबर 2025 को उनके पाबना स्थित घर से डिटेक्टिव ब्रांच (डीबी) पुलिस ने गिरफ्तार किया था।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बांग्लादेश में प्रसिद्ध संगीतकार और आवामी लीग के पाबना जिला इकाई के सांस्कृतिक मामलों के सचिव प्रोलय चाकी की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। चाकी 11 जनवरी की रात करीब 9:15 बजे राजशाही मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से नहीं रहे। वे पाबना जिला जेल में बंद थे और स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें पहले पाबना सदर अस्पताल, फिर राजशाही रेफर किया गया था।
परिवार और आवामी लीग समर्थकों का आरोप है कि यह मौत सामान्य नहीं, बल्कि लापरवाही और यातना का नतीजा है। उनका कहना है कि चाकी को पहले से दिल की बीमारी, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर था, लेकिन जेल में उन्हें सही इलाज या सीसीयू जैसी सुविधा नहीं दी गई। बेटे सनी चाकी ने कहा कि उनके पिता को कैदी सेल में ही रखा गया, जबकि उन्हें स्पेशल केयर की जरूरत थी।
झूठे केस में हुई थी गिरफ्तारी?
प्रोलय चाकी को 16 दिसंबर 2025 को उनके पाबना स्थित घर से डिटेक्टिव ब्रांच (डीबी) पुलिस ने गिरफ्तार किया था। मामला स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन आंदोलन पर कथित हमले से जुड़ा था। आवामी लीग के कार्यकर्ता इसे पूरी तरह फर्जी और राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताते हैं। उनका कहना है कि चाकी जैसे कई नेता बिना ठोस सबूत के जेल में डाले जा रहे हैं।
चाकी 1990 के दशक में काफी लोकप्रिय गायक थे। वे बांग्लादेश टेलीविजन (बीटीवी) पर नियमित परफॉर्म करते थे और अपने भाई मोलय चाकी के साथ मिलकर संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय रहे। राजनीति में भी वे आवामी लीग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते थे। उनकी मौत ने संगीतकारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक में शोक की लहर दौड़ा दी है। कई जाने-माने कलाकारों ने दुख जताया है।
हिरासत में मौतों का बढ़ता सिलसिला
यह कोई पहला मामला नहीं है। आवामी लीग समर्थकों का दावा है कि मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार आने के बाद से हिरासत में मौतों का आंकड़ा बहुत तेजी से बढ़ा है। 3 जनवरी तक पार्टी के 41 नेता और कार्यकर्ता कथित तौर पर पुलिस या जेल हिरासत में मर चुके थे। प्रोलय चाकी की मौत के साथ यह संख्या और बढ़ गई है। पार्टी का आरोप है कि ऐसे मामले लगभग हर महीने सामने आ रहे हैं।
आवामी लीग ने इसे व्यवस्थित साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि जेलों में यातना, इलाज से इनकार और मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना आम हो गई है। कई मामलों में मौत को दिल का दौरा या पुरानी बीमारी बता दिया जाता है, लेकिन परिवार वाले इसे हत्या का मामला मानते हैं। पार्टी ने मानवाधिकार संगठनों पर भी सवाल उठाए हैं कि वे इन घटनाओं पर चुप क्यों हैं।
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