Rafale deal : भारतीय वायु सेना में लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या लगातार घट रही है। इसी चिंता के बीच भारत और फ्रांस के बीच राफेल लड़ाकू विमानों की अगली खरीद को लेकर बातचीत तेज हो गई है। बताया जा रहा है कि अगले महीने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा से पहले इन वार्ताओं में और तेजी आ सकती है। भारतीय वायु सेना चाहती है कि लंबे समय से अटके मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम के तहत एक अस्थायी समाधान के रूप में और राफेल विमान खरीदे जाएं। इसके लिए फ्रांस के साथ सरकार-से-सरकार (G2G) समझौते पर जोर दिया जा रहा है। MRFA योजना के तहत कुल 114 आधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद प्रस्तावित है, जिनमें से बड़ी संख्या भारत में विदेशी सहयोग से बनाने की योजना है।
जानकारी के मुताबिक, अंतिम फैसला रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की मंजूरी के बाद ही होगा। लेकिन वायु सेना ने साफ कर दिया है कि लड़ाकू स्क्वाड्रनों की कमी को देखते हुए अतिरिक्त राफेल विमानों की तुरंत जरूरत है।
स्क्वाड्रन के नंबर्स को लेकर बढ़ी मुश्किल
भारतीय वायु सेना के पास इस समय सिर्फ 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन बचे हैं। जबकि चीन और पाकिस्तान से एक साथ होने वाले खतरे का सही तरीके से मुकाबला करने के लिए वायु सेना को 42.5 स्क्वाड्रन की जरूरत मानी जाती है। आम तौर पर एक स्क्वाड्रन में 16 से 18 लड़ाकू विमान होते हैं। पिछले साल मिग-21 विमानों के रिटायर होने के बाद स्थिति और बिगड़ गई। इससे वायु सेना के पास मौजूद लड़ाकू विमानों की संख्या और कम हो गई। अधिकारियों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह कमी साफ नजर आई, जिससे यह चिंता बढ़ी कि किसी दो-तरफा खतरे की स्थिति में वायु सेना अपनी ताकत कैसे बनाए रखेगी।
मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) परियोजना करीब 7–8 साल पहले शुरू हुई थी और इसकी अनुमानित लागत 1.2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। लेकिन प्रक्रियाओं में देरी और बदलती प्राथमिकताओं के कारण यह योजना अब तक आगे नहीं बढ़ पाई है। ऐसे में, पहले से वायु सेना में शामिल राफेल लड़ाकू विमान को इस कमी को जल्दी पूरा करने का सबसे तेज़ और व्यवहारिक विकल्प माना जा रहा है।
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‘मेक इन इंडिया’ पर खास ज़ोर
रक्षा सूत्रों के अनुसार, अगर राफेल विमानों की संख्या बढ़ाने का नया समझौता होता है, तो उसमें ‘मेक इन इंडिया’ को खास अहमियत दी जाएगी। इसका मतलब है कि विमानों के निर्माण में भारत में उत्पादन की भूमिका बड़ी होगी। भारत पहले ही नौसेना के लिए 24 राफेल-एम विमान खरीदने का सौदा कर चुका है। यह सौदा वायु सेना के लिए भविष्य में होने वाले राफेल ऑर्डर की कीमत और शर्तें तय करने का आधार बन सकता है।
भारत और फ्रांस की रक्षा कंपनियों के बीच सहयोग भी लगातार बढ़ रहा है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड ने डसॉल्ट एविएशन के साथ मिलकर हैदराबाद में एक प्लांट शुरू किया है। यहां राफेल विमान के मुख्य फ्यूजलेज (ढांचा) बनाए जाएंगे। उम्मीद है कि यह प्लांट वित्त वर्ष 2028 तक अपने पहले कंपोनेंट की डिलीवरी शुरू कर देगा। आगे चलकर यह फैक्ट्री भारत और दुनिया की जरूरतों के लिए हर साल 24 फ्यूजलेज बनाने की क्षमता हासिल कर सकती है।
सूत्रों के मुताबिक, राफेल से जुड़ी कुछ समानांतर योजनाओं पर भी काम चल रहा है। इनमें हैदराबाद में एक इंजन मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री और जेवर (उत्तर प्रदेश) में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) हब बनाने की योजना शामिल है। इन सभी प्रोजेक्ट्स के पूरे होने पर राफेल विमान के निर्माण से जुड़ी करीब 60 प्रतिशत वैल्यू भारत में ही तैयार हो सकेगी। अधिकारियों का मानना है कि तुरंत ऑपरेशनल जरूरत, देश में तैयार हो रहा इंडस्ट्रियल ढांचा और ऊंचे स्तर की राजनीतिक बातचीत—इन तीनों के मेल से आगे बढ़ने के लिए अनुकूल माहौल बना है। हालांकि अभी किसी औपचारिक घोषणा की उम्मीद नहीं है, लेकिन इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा के दौरान राफेल से जुड़े मुद्दों पर खास चर्चा होने की संभावना है। किसी भी अंतिम समझौते से पहले रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की मंजूरी, लागत से जुड़ी बातचीत पूरी होना और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की अंतिम स्वीकृति जरूरी होगी।
तेजस Mk1A में देरी से बढ़ीचिंता
भारतीय वायु सेना पर दबाव और बढ़ गया है, क्योंकि स्वदेशी LCA तेजस Mk1A की डिलीवरी में देरी हो रही है। इस विमान से उम्मीद थी कि यह वायु सेना की फ्रंटलाइन ताकत को जल्दी मजबूत करेगा। वायु सेना ने तेजस Mk1A के 83 विमानों का ऑर्डर दिया है। इसके अलावा रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने 97 और जेट खरीदने को भी मंजूरी दी है। लेकिन सप्लाई चेन की दिक्कतें, इंजन की उपलब्धता और उत्पादन बढ़ाने में आ रही समस्याओं के कारण विमानों की डिलीवरी तय समय पर नहीं हो पाई है।
वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भी सार्वजनिक तौर पर इस देरी पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि तेजस Mk1A में देरी के कारण मिग-21 जैसे पुराने विमानों को हटाने से जो कमी बनी थी, वह और बढ़ गई है। इन हालातों में वायु सेना को अपनी तैयारी बनाए रखने के लिए अतिरिक्त राफेल विमानों जैसे अस्थायी विकल्पों पर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है। |
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