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जननायक के बिना पहली बार: शिबू सोरेन की यादों में डूबा राज्य, खामोश है आंदोलन की वह गूंज

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संघर्ष, स्वाभिमान और आदिवासी अधिकारों की आवाज अब सिर्फ स्मृतियों में।



प्रदीप सिंह, रांची। 11 जनवरी झारखंड के जननायक, दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्मदिन है। हर साल यह दिन राज्य के लिए उत्सव, संघर्ष की स्मृति और आदिवासी स्वाभिमान के संकल्प का प्रतीक होता था। गांव-गांव, शहर-शहर में कार्यक्रम होते थे, आंदोलनों के किस्से दोहराए जाते थे और नई पीढ़ी को संघर्ष की विरासत से जोड़ा जाता था।

पूरे प्रांत से मोरहाबादी स्थित दिशोम गुरु के आवास पर दिनभर जमावड़ा लगा रहता है। बाबा सबसे मिलते और हालचाल पूछना नहीं भूलते, लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है। दिशोम गुरु की अनुपस्थिति ने झारखंड को एक गहरे खालीपन का एहसास करा दिया है। शिबू सोरेन सिर्फ एक नेता नहीं थे, वे एक जीवंत आंदोलन के नायक थे।

जल-जंगल-जमीन की लड़ाई से लेकर अलग झारखंड राज्य के गठन तक उन्होंने आदिवासी समाज को राजनीतिक चेतना दी। 1970 के दशक में जब आदिवासी अस्मिता हाशिये पर थी, तब शिबू सोरेन ने अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। जेल, आंदोलन, दमन के बावजूद उन्होंने कभी अपने मूल विचारों से समझौता नहीं किया।
अलग राज्य के आंदोलन को दिया मुकाम

झारखंड अलग राज्य आंदोलन की बात शिबू सोरेन के बिना अधूरी है। उन्होंने न सिर्फ सड़क से संसद तक इस मुद्दे को पहुंचाया, बल्कि इसे राष्ट्रीय राजनीति के एजेंडे में शामिल कराया। आदिवासी बहुल क्षेत्रों की उपेक्षा, संसाधनों की लूट और सामाजिक अन्याय के खिलाफ उनकी आवाज ने लाखों लोगों को एकजुट किया।

15 नवंबर 2000 को जब झारखंड राज्य बना तो उसमें दिशोम गुरु के दशकों के संघर्ष की छाप थी। दिशोम गुरु आदिवासी समाज के स्वाभिमान का प्रतीक थे। उन्होंने सिखाया कि अपनी पहचान पर गर्व करना कमजोरी नहीं, ताकत है।

चाहे सरना धर्म की मान्यता का सवाल हो या विस्थापन के खिलाफ संघर्ष, शिबू सोरेन हमेशा आदिवासी समाज के साथ खड़े रहे। उनके भाषणों में सरलता थी, लेकिन संदेश में गहराई थीस जो सीधे लोगों के दिल तक पहुंचती थी।
राजनीतिक विरासत और वर्तमान पर असर

उनकी अनुपस्थिति आज झारखंड की राजनीति में साफ महसूस की जा रही है। वह एक ऐसे नेता थे, जो विरोध और संवाद दोनों को संतुलित करना जानते थे। सत्ता में रहते हुए भी उन्होंने आंदोलनकारी चरित्र नहीं छोड़ा।

वे लोगों को अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़े रहने का संदेश देते थे। दिशओम गुरु शिबू सोरेन शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, संघर्ष और सपने आज भी झारखंड की आत्मा में जीवित हैं।

दिशोम गुरु की सबसे बड़ी विरासत है, संघर्ष से डरना नहीं। उनका जीवन नई पीढ़ी को यह सिखाता है कि अधिकार खुद नहीं मिलते, उन्हें हासिल करना पड़ता है। 11 जनवरी को झारखंड उन्हें सिर्फ याद नहीं कर रहा, बल्कि उस खालीपन को महसूस कर रहा है, जिसे भर पाना आसान नहीं है।
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