कुमाऊं विश्वविद्यालय की सेमेस्टर की परीक्षा के दौरान सामने आए चौंकाने वाले मामले. File Photo
सुमित जोशी, हल्द्वानी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विद्यार्थियों के समग्र विकास पर जोर दिया गया है। इसके बेहतर क्रियान्वयन के लिए सरकार कई योजनाएं भी चला रही है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लेकर प्रयास तो हो रहे हैं, लेकिन सरकारी कालेजों में प्रवेश लेने के बाद छात्र-छात्राएं कक्षाओं में नजर नहीं आते हैं। इन सबके बीच कुमाऊं विश्वविद्यालय की सेमेस्टर परीक्षाओं में अजब-गजब और चिंताजनक स्थिति सामने आई है। विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों में परीक्षा देने आ रहे स्नातक प्रथम सेमेस्टर के कई छात्र-छात्राओं को अपने विषयों की जानकारी तक नहीं है।
वह विषयों के बीच अंतर तक नहीं कर पा रहे हैं। प्रदेश के सबसे बड़े महाविद्यालय एमबीपीजी हल्द्वानी में सबसे ज्यादा ऐसे मामले आ रहे हैं। जिसमें मुख्य विषय (डीएससी) की परीक्षा के दिन क्षमता संवर्धन पाठ्यक्रम (एईसी) या मूल्य योजना पाठ्यक्रम (वीएसी) का एग्जाम देने पहुंच रहे हैं। स्नातक कला (बीए) प्रथम सेमेस्टर में ऐसे विद्यार्थियों की भरमार है, जो अपने चयनित विषयों और उनके अंतर्गत लागू प्रश्नपत्रों से ही बेखबर हैं।
साथ ही रोजाना इस तरह के 100 से अधिक मामले आने से प्राध्यापक भी छात्र-छात्राओं की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। बीए शिक्षा शास्त्र की परीक्षा में भी ऐसा ही हुआ। शिक्षा और समाज के पेपर के दिन माइनर में मूल्य शिक्षा और वीएसी में पर्यावरण शिक्षा का चयन करने वाले विद्यार्थी पहुंच गए। इतना ही नहीं कालेज प्रशासन की ओर से विषयों को लेकर स्पष्टता करने के बाद भी कर्मचारियों से बहस भी कर रहे हैं।
केस 1.
संस्कृत नीति साहित्य के दिन भाषा का पेपर देने आए
बीए प्रथम सेमेस्टर में डीएससी के रूप में संस्कृत विषय लेने वालों का संस्कृत नीति साहित्य और व्याकरण का पेपर था। जबकि, एनईपी के संशोधित पाठ्यक्रम में एईसी के तहत भाषा विषयों की पढ़ाई अनिवार्य की गई है। इसमें संस्कृत भाषा व्याकरण का चयन करने वाले विद्यार्थी नीति साहित्य की परीक्षा के दिन पेपर देने पहुंच गए।
केस 2.
अंग्रेजी साहित्य का पेपर भाषा की परीक्षा देने वालों की भीड़
बीए अंग्रेजी के पेपर के दिन भी कुछ इसी प्रकार की स्थिति उत्पन्न हुई। एग्जाम प्रारंभ होने के साथ अंग्रेजी का पहला पेपर अंग्रेजी साहित्य के इतिहास का था। एईसी में अंग्रेजी भाषा का चयन करने वाले विद्यार्थी मुख्य विषय की परीक्षा देने पहुंच गए। प्रवेश पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख होने के बाद भी छात्र गलत दिन कालेज आ गए।
उपस्थिति के 75 प्रतिशत मानकों की अनदेखी का नतीजा
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रविधानों के अनुसार एक सेमेस्टर में 90 दिन पढ़ाई अनिवार्य है। साथ ही न्यूनतम 75 प्रतिशत उपस्थिति का मानक है। लेकिन कालेजों में अक्टूबर तक प्रवेश प्रक्रिया चली। इसके बाद कुवि ने परीक्षा से ठीक पहले दिसंबर में भी तीन दिन के लिए यूजी व पीजी की खाली सीटों में दाखिले को पोर्टल खोला। विश्वविद्यालय प्रशासन हमेशा 90 दिन पढ़ाई का मानक पूरा करने तर्क देता है। लेकिन जिन्होंने बाद में प्रवेश लिया तो उनकी पढ़ाई कैसे पूरी हुई और किस तरह से 75 प्रतिशत उपस्थिति के नियम को पूरा किया गया यह बढ़ा सवाल है। सख्ती न होने पर कालेजों में कक्षाएं खाली रहना और विद्यार्थियों का सीधे परीक्षा देने आना ऐसे हालातों का कारण माना जा रहा है।
एनईपी में विद्यार्थियों के समग्र विकास और दक्षता विकसित करने पर जोर दिया गया है। यदि नियमित मोड के कालेजों में छात्रों को परीक्षा तक विषयों की स्पष्ट जानकारी नहीं है तो यह चिंताजनक है। जब तक 75 प्रतिशत उपस्थिति के नियम का सख्ती से पालन नहीं होगा तब तक स्थिति बनी रहेगी। सुधार की दिशा में काम होना चाहिए। - प्रो. डिगर सिंह फर्स्वाण, निदेशक, स्कूल आफ एजुकेशन, यूओयू
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