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झारखंड में हाथियों से दहशत में ग्रामीण, जनवरी 2026 में 21 मौतें; हर दिन दो शिकार

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चक्रधरपुर-राउरकेला रेल खंड में रेल लाइन के समीप हाथियों का विचरण। (फाइल फोटो)



जागरण टीम, रांची/हजारीबाग/चाईबासा। झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष (Human-Elephant Conflict) चरम पर पहुंच गया है। जनवरी 2026 के महज 8 दिनों में हाथी हमलों में 21 लोगों की मौत हो चुकी है, जो हर दिन औसतन दो मौतों का आंकड़ा छू रहा है।

यह सिलसिला दिसंबर 2025 से शुरू हुआ, लेकिन जनवरी में रफ्तार पकड़ ली है। पश्चिमी सिंहभूम और हजारीबाग जैसे जिलों में जंगली हाथियों के झुंड और अलग-थलग पड़े दांतेदार हाथियों ने ग्रामीण इलाकों में कहर बरपा रखा है।

एक ही सप्ताह में 16 मौतें दर्ज की गई हैं, जिसमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं। दर्जनों लोग घायल हैं। ग्रामीणों में भय का माहौल है, और वे वन विभाग से नियमित गश्त, हाथियों को जंगल की ओर खदेड़ने और सुरक्षित आवास की मांग कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सर्दियों में फसल कटाई के बाद ग्रामीणों का झोपड़ियों में सोना और हाथियों का \“मस्त\“ (musth) अवस्था में आक्रामक होना मुख्य कारण हैं।
हजारीबाग में दंपति पर हमला, पति की मौत

मुफस्सिल थाना क्षेत्र के सरौनी गांव में हाथियों के झुंड ने देर रात आतंक मचाया। ग्रामीणों के अनुसार, अचानक गांव में घुसे हाथियों ने आदित्य राणा और उनकी पत्नी पर हमला कर दिया। आदित्य राणा की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उनकी पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गईं।

ग्रामीणों ने साहस दिखाते हुए महिला को बचाया और सदर अस्पताल पहुंचाया, जहां उनका इलाज जारी है। घटना के बाद पुलिस और वन विभाग को सूचित किया गया। सरौनी सहित आसपास के गांवों में हाथियों की लगातार आवाजाही से दहशत फैली हुई है।

ग्रामीणों ने वन विभाग से इलाके में गश्त बढ़ाने और हाथियों को जंगल की ओर भगाने की मांग की है, ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
पश्चिमी सिंहभूम में एक रात में 7 मौतें

पश्चिमी सिंहभूम जिले के नोवामुंडी प्रखंड में एक दांतेदार जंगली हाथी ने मंगलवार देर रात भीषण हमला किया, जिसमें एक ही परिवार के चार सदस्य समेत सात ग्रामीणों की मौत हो गई।

सबसे भयावह घटना बाबाडिया गांव के मुंडा साईं टोला में हुई, जहां सोते हुए सनातन मेराल (53), उनकी पत्नी जोलको कुई (51), पुत्र मंगडू मेराल (6) और पुत्री दमयंती मेराल (8) को हाथी ने सूंड़ से उठाकर पटक-पटक कर मार डाला।

परिवार की 10 वर्षीय बेटी सुशीला मेराल किसी तरह बच गई, लेकिन उसके पैर में फ्रैक्चर हो गया। वहीं, 14 वर्षीय पुत्र जयपाल मेराल जंगल की ओर भागकर बच निकला।

हाथी का आतंक यहीं नहीं थमा। उलीहातु टोला में गुरुचरण लागुरी (21) को कुचल दिया गया, जिसकी अस्पताल में मौत हो गई। गोमेया लागुरी, हिंदू लागुरी और गुराय लागुरी भी घायल हुए।

बड़ापासेया गांव में मंगल की मौके पर मौत हो गई। हाटगम्हरिया के सियालजोड़ा गांव में चिपरी हेम्ब्रम (46) और उनके बेटे किरपा हेम्ब्रम (7) पर हमला हुआ, जिसमें चिपरी की मौत हो गई।

यह वही हाथी है जो एक सप्ताह में 16 लोगों की जान ले चुका है, जिसमें गोइलकेरा और टोंटो इलाकों में पहले चार मौतें शामिल हैं। हाथी रात में हमला करता है और दिन में घने जंगलों में छिप जाता है, जिससे ट्रैकिंग मुश्किल हो रही है।
क्यों बढ़ रहा है संघर्ष?

झारखंड में हाथी हमलों का सिलसिला राज्य गठन के बाद से 1,300 से ज्यादा मौतों तक पहुंच चुका है। जनवरी में स्पाइक के पीछे मुख्य कारण:

  • हाथियों का मस्त अवस्था में आक्रामक होना, जहां वे झुंड से अलग होकर हिंसक हो जाते हैं।
  • सर्दियों में ग्रामीणों का धान की भूसी से बने झोपड़ियों (कुंबा) में सोना, जो गर्माहट देता है लेकिन हाथियों के लिए आसान निशाना बन जाता है।
  • जंगलों का कटाव और मानवीय अतिक्रमण, जिससे हाथी गांवों की ओर रुख करते हैं।
  • रामगढ़ जैसे इलाकों में ग्रामीणों द्वारा हाथियों पर तीर-कमान से हमला, जो उन्हें और उग्र बनाता है।

वन विभाग का दावा, ड्रोन से निगरानी

वन विभाग ने 80 से ज्यादा कर्मियों की टीम तैनात की है, जिसमें क्विक रेस्पॉन्स टीम शामिल। पश्चिमी सिंहभूम में थर्मल कैमरा वाले ड्रोन से रीयल-टाइम मॉनिटरिंग हो रही है, गांवों को अलर्ट जारी किए जा रहे हैं। कोल्हान में हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया है।

बंगाल और ओडिशा से विशेषज्ञ बुलाए गए हैं, और वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (देहरादून) तथा वनतारा रेस्क्यू सेंटर (जामनगर) की टीमें ट्रैंक्विलाइजेशन और रिलोकेशन पर काम कर रही हैं। ग्रामीणों को टॉर्च, पटाखे बांटे जा रहे हैं, और जोखिम वाले इलाकों से अस्थायी तौर पर लोगों को सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट किया जा रहा है।

एक्स-ग्रेशिया सहायता और घायलों का इलाज प्रदान किया जा रहा है। हालांकि, घने जंगलों और कोहरे के कारण ऑपरेशन में चुनौतियां हैं, और माओवाद प्रभावित इलाकों में IEDs (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज) का खतरा भी है।
ग्रामीणों की मांग- स्थायी समाधान हो

ग्रामीण वन विभाग से स्थायी समाधान मांग रहे हैं, जैसे जंगलों में हाथियों के लिए फूड कॉरिडोर बनाना, बाड़ लगाना और नियमित पटाखे व शोर से हाथियों को दूर रखना। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि ग्रामीणों को जागरूक करें और झोपड़ियों में सोने से बचें।

यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो झारखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी चुनौती बन सकता है। सरकार को तत्काल बड़े स्तर पर इंटरवेंशन की जरूरत है, वरना जनवरी का यह कहर पूरे साल की त्रासदी बन सकता है।
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