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जसुपा के आंगन में अभी गहरा सन्‍नाटा; सूर्य के रुख का इंतजार कर रहे पीके! क्‍या 10 हजारी से म‍िलेगी संजीवनी?

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मकर संक्रांत‍ि के बाद पीके की यात्रा शुरू होने की संभावना।  



विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। Bihar Politics: बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Chunav 2025) की करारी पराजय ने जन सुराज पार्टी (JSP) को तो जैसे सकते में ला दिया है।

चुनाव बाद से ही सांगठनिक गतिविधियां लगभग ठप-सी हैं और पटना में उसके चारों परिसरों (दो कार्यालय, एक प्रशांत किशोर का विश्राम-स्थल और एक कंट्रोल रूम) में सन्नाटा पसरा हुआ है।

सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) भी अभी बिहार से बाहर हैं। सूत्र बता रहे कि अगली रणनीति के लिए अभी वे धन के प्रबंध में लगे हैं। संभव है कि मकर संक्रांति के बाद वे फिर से सक्रिय हों। यह सक्रियता उनके बिहार के एक और परिभ्रमण के रूप में हो सकती है।

दो वर्ष तक बिहार के गांव-गली की खाक छानने (जन सुराज पदयात्रा) के बाद पीके ने वर्ष 2024 में दो अक्टूबर को जन सुराज पार्टी के गठन की सार्वजनिक घोषणा की थी।

उसी वर्ष विधानसभा की चार सीटों पर हुए उप चुनाव में जसुपा को लगभग 10 प्रतिशत वोट मिले थे। उस वोट को जनाधार मानकर पीके अति-उत्साहित हो गए। विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की घोषणा के साथ ही जसुपा को लेकर एनडीए निश्चिंत हो गया था।

परिणाम ने पीके के उत्साह पर पानी फेर दिया। 238 प्रत्याशियोंं के बूते मात्र तीन प्रतिशत वोट मिले। पराजय के पश्चाताप में पीके ने उसी भितिहरवा आश्रम में बापू की प्रतिमा के नीचे एक दिन का मौन व्रत रखा, जहां से वे जन सुराज यात्रा की शुरुआत किए थे।
सूर्य के उत्तरायण होने के साथ सांगठनिक गतिविधियों के जोर पकड़ने का अनुमान

वस्तुत: अब तक की उपलब्धि संकेत कर रही कि नई रणनीति के बिना जसुपा के लिए गुंजाइश नहीं। पराजय के बाद अपनी सार्वजनिक प्रतिक्रिया में पीके ने इसके लिए हामी भी भरी है।

उन्होंने हार से हतोत्साहित नहीं होने की बात कही और इसे संघर्ष की नई शुरुआत बताया। अपनी 90 प्रतिशत संपत्ति और आगामी पांच वर्षों की 90 प्रतिशत कमाई जसुपा को दान करने की घाेषणा भी की।

इसके बावजूद अतिरिक्त धन की आवश्यकता है, क्योंकि दमदार बनने के लिए अभियान का संचालन अनवरत करना होगा। उनकी नई यात्रा इसकी पहली कड़ी होगी, जो 15 जनवरी से शुरू हो सकती है।

इस यात्रा को बिहार नवनिर्माण संकल्प यात्रा या बिहार संकल्प यात्रा की संज्ञा दी जा सकती है, जो लगभग डेढ़ वर्ष तक जारी रह सकती है। जसुपा को इससे नई संजीवनी की आशा है।
पीके की राजनीति के लिए तीन आसरे


01. आशा की किरण : जसुपा को लगभग तीन प्रतिशत वोट मिले हैं। 35 सीटों पर जीत के अंतर से अधिक वोट लेकर उसने स्पाइलर की भूमिका निभाई। गिनती की सीटों पर वह तीसरे पर रही। जनहित में अनवरत अभियान चलाने का माद्दा रखने वाली किसी पार्टी के लिए मद्धिम ही सही, लेकिन यह आशा की एक किरण है।

02. रणनीति का आधार : यात्रा के क्रम में पीके 1.18 लाख वार्डों तक पहुंचेंगे। विशेष फोकस महिलाओं पर होगा, विशेषकर उन योजनाओं की वास्तविक स्थिति का आकलन होगा, जिनके जरिये सरकार आधी आबादी तक लाभ पहुंचाने का दावा करती है। जैसे कि 10 हजारी योजना। यही से सरकार को घेरने की शुरुआत होगी।

03. राजनीति में पैंतरेबाजी : दस हजारी योजना से कारोबार आगे बढ़ाने वाली महिलाओं को 2.10 लाख रुपये देने की घोषणा हुई थी। हालांकि, सरकार अभी इसकी शर्तें तय करेगी, लेकिन पीके कह चुके हैं कि वे राजनीति तभी छोड़ेंगे, जब सरकार सभी महिलाओं को दो-दो लाख रुपये दे देती है। राजनीति में ऐसे पैंतरे खूब चलते हैं।
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