30 हजार के ज्यादा पानी के कनेक्शन नालियों के भीतर से गुजर रहे. Concept Photo
राहुल शुक्ल, कानपुर। सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे शुरू हुआ। यही वजह रही कि गंगा किनारे बसा होने के कारण अपना शहर तेजी से पैर पसारता गया। लेकिन, विस्तार की इस आंधी में मूलभूत सुविधाओं का ढांचा तेज हवा में उड़ गया। मूलभूत सुविधाओं में सर्वोपरि स्थान रखने वाला शुद्ध जल लोगों तक पहुंचाने में जिम्मेदार नाकाम रहे तो बड़ी आबादी ने अवैध तरीके से पानी के कनेक्शन लेकर जरूरतों को पूरा किया। घनी आबादी में चोरी-छिपे लिए गए ये कनेक्शन नालियों के भीतर से गुजर रहे हैं। इनमें लीकेज होने पर घरों तक दूषित जल पहुंच रहा है।
वहीं, नए बस रहे इलाकों में सीवर लाइन न पड़ने के कारण लोग सेप्टिक टैंक के भरोसे सीवेज का निस्तारण करने लगे। इनके बगल में जल स्रोत ( हैंडपंप, समर्सिबल पंप) होने की वजह से भी पानी दूषित हो रहा है। जिम्मेदारों की नाकामी और लोगों की मजबूरी में किए गए ये काम अब विकराल समस्या बन चुके हैं। इसकी वजह से शहर के 50 मुहल्लों की करीब तीन लाख आबादी ‘धीमा जहर’ पीने को मजबूर है।
घनी आबादी वाले इलाकों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। लाल कालोनी, अंबेडकर नगर, जूही बंबुरहिया, कोपरगंज, गांधीनगर, दर्शनपुरवा, चमनगंज, बेकनगंज, पेचबाग, कुली बाजार, परेड, हीरामन का पुरवा , रिजवी रोड, गम्मू का हाता, छोटे मियां का हाता, कंघीमोहाल, फूल वाली गली, पुराना सीसामऊ, नाला रोड, सरोजनी नगर, गोविंद नगर समेत अन्य मुहल्लों में ज्यादातर पाइप लाइन नालियों के भीतर से गुजर रही हैं। इसी तरह 30 हजार से ज्यादा कनेक्शन नालियों के माध्यम से दिए गए है।
पानी में लोहे के पाइप रहने के कारण जंग लगकर जर्जर हो जाते है। इसके चलते नाली का पानी इन पाइपों से घरों तक पहुंचता है। इसके अलावा अवैध कनेक्शन लेने के दौरान लोग मुख्य पाइप लाइन भी तोड़ देते है। ऐसे में बरसात में जलभराव होने पर हालात और भी खराब हो जाते हैं और शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां शुद्ध पेयजल की आपूर्ति हो पाती हो।
सीवर लाइन न पड़ना भी प्रमुख वजह
40 प्रतिशत इलाकों में अभी तक सीवर लाइन नहीं पड़ी है। इनमें कल्याणपुर खुर्द, कला, पशुपति नगर, दामोदर नगर, गोपाल नगर, जूही गढ़ा, राखी मंडी, सरायमीता, चंद्र नगर, हरबंश मोहाल, गुजैनी समेत करीब 150 अवैध बस्ती और 349 मलिन बस्ती शामिल हैं। यहां पर लोगों ने सीवर निस्तारण के लिए सेप्टिक टैंक बना रखे है, उसके बगल में ही भूजल के स्रोत (हैंडपंप और सबमर्सिबल पंप) हैं। ऐसे में इनका पानी भी धीरे-धीरे दूषित हो रहा है। इसके अलावा नानारामऊ, जाजमऊ, पनकी समेत कई इलाकों में लोगों ने सीवर लाइन न होने के कारण अपशिष्ट निस्तारण के लिए लोगों ने रिवर्स बोरिंग कर रखी है। इसके जरिये भीजल दूषित हो रहा है। अब मामला सामने आने पर नगर निगम और जलकल के अफसर जागे है।
अंग्रेजों के जमाने की पाइपलाइन कदम-कदम पर दे रही धोखा
आज भी ब्रिटिश काल में पड़ी पेयजल लाइनों के भरोसे ही जलापूर्ति हो रही है। जबकि, शहर का विस्तार तेजी हो रहा है। ऐसे में अधिक बोझ पड़ने पर ये पाइप लाइन कदम-कदम पर धोखा दे रही है। 1894 में बने भैरोघाट पंपिंग स्टेशन और वर्ष 1906 में मोतीझील में बने जलाशय से आपूर्ति के लिए पुराने संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं, गंगा बैराज के तीन ट्रीटमेंट प्लांट और गुजैनी का वाटर ट्रीटमेंट प्लांट को शुरू हुए 25 साल भी नहीं हुएं है और पूरा सिस्टम हांफने लगा है।
यहां पर करेंगे शिकायत
जलकल का कंट्रोल रूम नंबर - 9235553827, 9235553827
नगर निगम का कंट्रोल रूम नंबर -0512-2526004-2526005
ये हैं जिम्मेदार
- जलकल विभाग के अधिशासी अभियंता- जोन एक राजकुमार, जोन दो जेपी गुप्ता, जोन तीन नंद किशोर , जोन चार अनिल कुमार, जोन पांच ईश्वर सिंह जोन छह मोहम्म शमीम
- नगर निगम के अधिशासी अभियंता - जोन एक आरके तिवारी, जोन दो दिवाकर भास्कर, जोन तीन राजेश कुमार, जोन चार मीनाक्षी अग्रवाल, जोन पांच कमलेश पटेल और जोन छह आरके सिंह
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