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सिमुलतला रेल हादसे के बाद आसनसोल की डीआरएम के तबादले पर कैट का बड़ा फैसला

LHC0088 2026-1-7 14:56:40 views 732
  



संवाद सूत्र, सिमुलतला (जमुई)। पूर्व रेलवे के आसनसोल मंडल के अंतर्गत सिमुलतला क्षेत्र (लहाबन-टेलवा बाजार) में 27 दिसंबर 2025 को हुए भीषण मालगाड़ी हादसे के बाद रेलवे बोर्ड द्वारा आसनसोल की डीआरएम विनीता श्रीवास्तव को अचानक हटाए जाने के मामले में नया मोड़ आ गया है। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी), कोलकाता ने विनीता श्रीवास्तव की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके स्थानांतरण आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
क्या था मामला?

रेलवे बोर्ड ने 2 जनवरी 2026 को एक आदेश जारी कर विनीता श्रीवास्तव को आसनसोल डीआरएम पद से हटाकर पश्चिम मध्य रेलवे (डब्लूसीआर) भेज दिया था। उनकी जगह सुधीर कुमार शर्मा को कार्यभार सौंपा गया था। रेलवे प्रशासन का तर्क था कि दुर्घटना के बाद ट्रैक बहाली में देरी हुई क्योंकि डीआरएम ने 2.22 करोड़ रुपये के \“कैश इम्प्रेस्ट\“ (नकद अग्रदाय) के प्रस्ताव को मंजूरी देने में समय लगाया।

  • कोर्ट का आदेश: कैट, कोलकाता ने 5 जनवरी 2026 को सुनवाई करते हुए डीआरएम के ट्रांसफर पर रोक लगाई। अगली सुनवाई 8 जनवरी को होगी।
  • विवाद की जड़: 27 दिसंबर 2025 को सिमुलतला के पास हुए मालगाड़ी हादसे के बाद बहाली में देरी का आरोप।
  • डीआरएम का पक्ष: नियमों (एमएसओपी) के अनुसार वित्तीय मंजूरी के लिए डीआरएम की जरूरत नहीं थी, अधिकारी खुद सक्षम थे।

कोर्ट में खुली पोल: नियम बनाम आरोप...

विनीता श्रीवास्तव ने अपने वकील के माध्यम से कोर्ट में जो दस्तावेज पेश किए, वे रेलवे की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। नियमों की स्थिति: रेलवे के \“शेड्यूल आफ पावर्स\“ के अनुसार, दुर्घटना के समय राहत कार्य, क्रेन किराए पर लेने या अन्य खर्च के लिए जेएजी/एसजी स्तर के अधिकारियों के पास \“पूर्ण शक्तियां\“ होती हैं। इसके लिए न तो डीआरएम की मंजूरी की जरूरत होती है और न ही वित्त विभाग की सहमति की। फिर भी, अधिकारियों ने मंजूरी का इंतजार क्यों किया, यह जांच का विषय है। 75 घंटे तक साइट पर रहीं डीआरएम: दस्तावेजों के मुताबिक, डीआरएम 28 दिसंबर की रात 12:14 बजे ही साइट पर पहुंच गई थीं और लगातार 75 घंटे तक वहां रहकर बहाली कार्य की निगरानी करती रहीं।

देरी का असली कारण: रिपोर्ट बताती है कि बहाली में देरी का मुख्य कारण सड़क क्रेन और काउंटरवेट का देर से पहुंचना था, जिसकी व्यवस्था करना प्रधान मुख्य अभियंता और निर्माण संगठन की जिम्मेदारी थी, न कि डीआरएम की।
न्यायाधिकरण का सख्त रूख

न्यायाधिकरण (सीएटी) ने रेलवे प्रशासन से पूछा कि ऐसी क्या “प्रशासनिक आवश्यकता“ आ पड़ी थी कि डीआरएम को बिना उनका पक्ष सुने और बिना नोटिस दिए तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया? साथ ही, जिस दिन आदेश जारी हुआ, उसी दिन नए अधिकारी ने ज्वाइन भी कर लिया, जो सामान्य प्रक्रिया से परे है।

न्यायाधिकरण ने अपने आदेश कहा : “प्रतिवादियों (रेलवे) को निर्देश दिया जाता है कि वे अगली सुनवाई (08 जनवरी 2026) तक आज की स्थिति के अनुसार यथास्थिति बनाए रखें और कोई भी पीड़क कार्रवाई न करें।“
स्थानीय हलचल

  • सिमुलतला और झाझा क्षेत्र में इस हादसे को लेकर पहले से ही चर्चा गर्म थी। अब इस कानूनी लड़ाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हादसे के बाद उच्च स्तर पर अपनी कमियां छुपाने के लिए डीआरएम को \“बलि का बकरा\“ बनाने की कोशिश की गई थी।
  • अब सबकी नजरें 8 जनवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां रेलवे को कोर्ट के तीखे सवालों का जवाब देना होगा।  
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