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सिर्फ तेल के लिए ट्रंप ने नहीं किया था वेनेजुएला पर हमला, खतरे में था अमेरिकी डॉलर; Inside Story

LHC0088 4 day(s) ago views 366
  

विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर पर जब भी खतरा आता है, तो अमेरिका कार्रवाई जरूर करता है।



नीलू रंजन, नई दिल्ली। अमेरिकी डॉलर की बादशाहत पर खतरे को वेनेजुएला पर अमेरिका की सैन्य कार्रवाई की प्रमुख वजह बताया जा रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वेनजुएला पिछले कई सालों से चीन के साथ युआन में व्यापार कर रहा था। चीन वेनेजुएला का तेल का प्रमुख आयातक है। कूटनीतिक और रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर पर जब भी खतरा आता है, तो अमेरिका उसपर कार्रवाई जरूर करता है।

वेनेजुएला के तेल भंडारों का अमेरिका द्वारा इस्तेमाल की घोषणा कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्र्ंप ने अपनी मंशा भी जगजाहिर कर दी है। ध्यान रहे कि विश्व में सबसे बड़ा तेल भंडार वेनेजुएला के पास ही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की पूरी दुनिया पर बादशाहत के मूल में उसकी करेंसी डॉलर की बादशाहत है। 1974 में सऊदी अरब से समझौते के तहत सारा तेल व्यापार में डॉलर में होने और डॉलर को सोने से डिलिंक करने (यानी डॉलर छापने के लिए उतना सोना रखने की मजबूरी खत्म करने) के बाद डॉलर की बादशाहत पूरी दुनिया पर कायम हो गई, जो अभी तक चल रही है।

इसे सामान्य कूटनीतिक भाषा में पेट्रोडॉलर कहा जाता है। कुछ महीने पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने ब्रिक्स देशों की साझा करेंसी बनाने की स्थिति में 200 फीसद टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। कूटनीतिक और सुरक्षा मामले पर लंबे समय से काम कर रहे अजय साहनी के अनुसार \“\“ वेनुजुएला पर अमेरिका कार्रवाई के पीछे पेट्रोडालर भी अहम मुद्दा है। जहां भी पेट्रोडॉलर पर खतरा आता है अमेरिका उस पर एक्शन जरूर लेता है।\“\“

साहनी के अनुसार पूरी दुनिया डॉलर हासिल करने के लिए मेहनत करती है, लेकिन अमेरिका सिर्फ कागज का इस्तेमाल कर इसे छाप लेता है। दुनिया के कुल तेल रिजर्व का 20 फीसद रखने वाला वेनेजुएला अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चीन के साथ तेल का व्यापार चीनी करेंसी युआन में कर रहा है। इसके साथ ही ईरान और रूस जैसे देश भी चीन के साथ युआन में व्यापार कर रहे हैं। इसके साथ ही सऊदी अरब ने भी चीन के साथ सात बिलियन डॉलर की करेंसी की आपस में अदला-बदली का डील किया है और युआन में तेल व्यापार करने का संकेत भी दिया है।

अमेरिका इसे सीधे तौर पर पेट्रो डॉलर के लिए चुनौती के रूप में देखता है। इसके साथ ही ब्रिक्स जैसे संगठनों के साथ-साथ चीन भी अमेरिकी प्रभुत्व वाले अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग पेमेंट सिस्टम स्विफ्ट की जगह वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि दो देशों के बीच बिना डालर के स्थानीय मुद्रा में लेन-देन संभव हो सके। इसके लिए चीन ने क्रास बोर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (किप्स) तैयार किया है, जिससे 185 देशों के 4800 से अधिक बैंक जुड़ चुके हैं। इसी तरह से ब्रिक्स के देश भी ब्रिक्सपे के नाम से पेमेंट सिस्टम बनान रहे हैं।

सी उदय भास्कर जैसे कूटनीतिक और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ का मानना है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की जीडीपी का आकार इतना बड़ा है कि फिलहाल डॉलर की बादशाहत को कोई खतरा नजर नहीं आता है। उनके अनुसार दुनिया की 2025 में लगभग 113 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी में आधी हिस्सेदारी अमेरिका, यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की है। यूरोपीय संघ की मुद्रा यूरो भी एक तरह से अमेरिका से जुड़ा हुआ है।

19 ट्रिलियन जीडीपी वाला चीन और उससे कम जीडीपी वाले किसी देश की करेंसी फिलहाल डॉलर की जगह लेने को तैयार नहीं है। लेकिन दुनिया भर के केंद्रीय सरकारी बैंकों की डॉलर की जगह सोने को रिजर्व में रखने की बढ़ती प्रवृति नई दिशा का संकेत जरूर कर रही है। दो दशक पहले तक दुनिया भर के केंद्रीय सहकारी बैंकों में 77 फीसद रिजर्व डॉलर के रूप में रखा जाता था, जो घटकर लगभग 57 फीसद आ गया है।
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