यूके में बच्चों को जंक फूड विज्ञापनों से राहत 2026 से सख्त नियम लागू (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बच्चों की सेहत सुधारने के लिए ब्रिटेन सरकार ने एक बड़ा और अहम फैसला लिया है। अब बच्चों को निशाना बनाकर जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों के विज्ञापनों पर सख्त रोक लगाई गई है। सरकार का कहना है कि इससे मोटापे जैसी बीमरियों को रोकने और बच्चों को स्वस्थ जीवन की शुरुआत देने में मदद मिलेगी।
यूके सरकार के फैसले के मुताबिक, 5 जनवरी 2026 से टीवी पर रात 9 बजे से पहले जंक फूड और मीठे ड्रिंक्स के विज्ञापन दिखाना पूरी तरह बंद होगा। इसके अलावा, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ऐसे विज्ञापनों पर हर समय रोक रहेगी। यह नियम उन खाद्य पदार्थों पर लागू होगा जिनमें ज्यादा फैट, शुगर और नमक होता है।
सरकार ने क्या बनाया प्लान?
सरकार का मानना है कि इससे बच्चों को अस्वस्थ खाने की चीजों के बारे में बार-बार दिखने से बचाया जा सकेगा और परिवारों के लिए सही और हेल्दी विकल्प चुनना आसान होगा। यूके के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि सरकार का मकसद हर बच्चे को स्वस्थ शुरुआत देना है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह भी कहा कि अब ध्यान इस बात पर है कि बीमारियों का इलाज करने के बजाय उन्हें होनेसे पहले रोका जाए, ताकि लोग लंबे समय तक स्वस्थ रह सकें और जरूरत पड़ने पर NHS (नेशनल हेल्थ सर्विस) बेहतर तरीके से काम कर सके।
सरकार ने बढ़ाया शुगर टैक्स
यह फैसला पहली बार दिसंबर 2024 में घोषित किया गया था। इसके अलावा सरकार पहले ही शुगर टैक्स को बढ़ा चुकी है जिसमें अब मिल्कशेक, रेडी-टू-ड्रींक कॉफी और मीठे योगर्ट ड्रिंक्स जैसे पैकेट वाले उत्पाद भा शामिल हैं।
सरकार के अनुसार, शोध से साफ है कि विज्ञापन बच्चों की खाने की आदतों पर असर डालते हैं। इससे कम उमआ में ही अस्वस्थ खाने की पसंद बन जाती है, जो आगे चलकर मोटापा और दूसरी बीमारियों की वजह बनती है।
आंकड़ों के मुताबिक, इंग्लैंड में प्राइमेरी स्कूल शुरू करने वाले करीब 22% बच्चे ज्यादा वजन या मोटापे के शिकार हैं। यह संख्या 11 साल की उम्र तक एक-तिहाई से ज्यादा हो जाती है। वहीं, दांतों में सड़न 5 से 9 साल के बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने की सबसे बड़ी वजह है।
कितने बच्चों को मोटापे से बचाया जा सकेगा?
सरकारी अनुमान के अनुसार, इस प्रतिबंध से हर साल बच्चों के खाने के करीब 7.2 अरब कैलोरी कम होंगी। इससे लगभग 20 हजार बच्चों में मोटापे के मामले रोके जा सकेंगे। सरकार का कहना है कि लंबे समय में इससे हेल्थ सिस्टम पर दबाव कम होगा और पूरी आबादी को सेहत से जुड़े फायदे मिलेंगे।
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