अमृत मिशन।
अरविंद पांडेय, नई दिल्ली। देश में शुद्ध पेजयल न मुहैया होने से हर साल चार लाख लोगों की मौत डायरिया से हो रही है, साथ ही करीब करोड़ लोग दिव्यांगता या दूसरी संक्रमित बीमारियों के शिकार हो रहे है। लेकिन राज्य सरकारों की तंद्रा नहीं टूट रही।
लगातार देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब जीत रहे इंदौर में अशुद्ध पेयजल से हुई मौत ने थोड़ा झकझोरा तो है तो लेकिन सच्चाई यह है कि पेयजल आपूर्ति अभी तक राज्य सरकारों की प्राथमिकता में आ ही नहीं पाया है। केवल आंकड़े देख लीजिए तो पता चल जाएगा।
शुद्ध पेयजल की आपूर्ति व सीवर लाइन के लिए स्वीकृत 1.93 करोड़ रुपये की योजनाओं में केवल 44 हजार करोड़ के काम पूरे हो पाए हैं जबकि अमृत (अटल नवीनीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन) की अवधि इसी साल मार्च में खत्म हो रही है।
इंदौर तो एक झांकी है। सच्चाई यह है कि सीवर और पेयजल लाइन की खराब प्लानिंग व डिजायन, जल संचयन के अपर्याप्त प्रबंधन और शुद्धीकरण के लिए इंतजाम व निगरानी के अभाव ने ऐसी स्थिति खड़ी कर दी है कि कोई भी शहर ऐसा नहीं कुछ आबादी तक अशुद्ध जल ही पहुंचता है।
शासन प्रशासन और जन प्रतिनिधियों के कान में घंटी तब बजती है जब मौतें हों। इंदौर में भी यही हुआ है। इंदौर का विरोधाभाष देखिए- इंदौर शहर के पास के एक गांव रालामंडल में ग्रामीण जल जीवन मिशन के तहत सभी काम पूरे दिखाया जा रहा है।
इंटरनेट पर आंकड़ा बताता है कि इस गांव में पेयजल की शुद्धता की आखिरी जांच 17 दिसंबर 2025 को हुई और सबकुछ दुरुस्त पाया गया। लेकिन शहर में मौत से पहले की जो अनदेखी हुई और मंत्री स्तर से संवेदनहीनता दिखी वह कुछ और बयां कर रहा है।
बहुत संभव है कि कागजी घोड़े ज्यादा दौड़ लगा रहे हैं। इस मिशन के तहत आबादी के हिसाब से फंडिग पैटर्न है जिसमें केंद्र और राज्यों की भागीदारी होती है। संभवत: कई राज्यों में फंड की कमी भी आड़े आ रही हो लेकिन यह सच है राजनीतिक फ्रीबीज में कोई राज्य पीछे नहीं है।
जल की समस्या को दूर करने के लिए पहली बार केंद्र की ओर से दो मिशन शुरू किए है, इनमें एक शहरी क्षेत्रों में शुद्ध पेजयल और सीवरेज प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए अमृत मिशन है, जबकि दूसरा ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक घर तक शुद्ध नल जल मुहैया कराने के लिए जल जीवन मिशन है। पर इस मूलभूत जरूरत के लिए राज्य सरकारों में सक्रियता की कमी रही।
शुद्ध पेजयल मुहैया कराने से जुड़ी परियोजनाओं पर राज्यों के इस सुस्त रवैए और केंद्र की कमजोर निगरानी पर हाल ही में संसदीय समिति ने भी सवाल खड़े किए है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में केंद्र से तत्काल हस्तक्षेप करने को कहा है।
अमृत मिशन 1.0 में जहां 32 पुराने जल शोधन संयत्रों के उन्नयन से जुड़ी परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है,जबकि अमृत मिशन 2.0 में 132 नए जल शोधन संयंत्रों को लगाने की परियोजना स्वीकृत की गई है, लेकिन राज्यों की सुस्त रवैया कुछ इस तरह है कि इनमें से सिर्फ चार परियोजनाएं ही अब तक पूरी हो पायी है।
इनमें 43 सबसे अधिक जल शोधन संयंत्रों को लगाने के प्रस्ताव मध्य प्रदेश में स्वीकृत किए गए है, जबकि अभी तक एक भी पूरा नहीं हो पाया है। इन मिशनों के तहत नगरीय निकायों और गांव पंचायतों को भी हर घर शुद्ध जल मुहैया कराने के लिए एक तंत्र विकसित करने के लिए कहा गया था। ताकि इन परियोजनाओं को आगे भी बेहतर ढंग से संचालित और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए विस्तार दिया जा सके।
इनमें पानी पर कर लगाने और उसे वसूलने और पानी की 24 घंटे उपलब्धता सुनिश्तिच करने जैसे कदम उठाने के लिए कहा गया था। लेकिन इन पर भी कुछ नगरीय निकायों को छोड़ दें तो कहीं कोई काम नहीं हुआ।
प्रति व्यक्ति 17 सौ घन मीटर से कम वार्षिक जल उपलब्धता है तो माना जाता है जल संकट
वैश्विक मानक को देखे तो यदि प्रति व्यक्ति 17 सौ घन मीटर से कम वार्षिक जल उपलब्धता है तो उसे जल संकट माना जाएगा। जबकि देश में मौजूदा समय में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1341 घन मीटर हो गई है, जबकि यह 2021 में 1487 घन वर्ग मीटर थी। यानी देश में जल संकट बढ रहा है। वहीं यदि यह आंकड़ा एक हजार घन मीटर से कम होने पर जल अभाव की स्थिति माना जाता है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 20 सबसे अधिक जल संकटग्रस्त शहरों में पांच भारत से आते है। जिसमें दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरू और हैदराबाद शामिल है।
मंत्रालय की घर-घर जल पहुंचाने की पहल को इस संकट से निपटने की कोशिश माना जा रहा है। मौजूदा समय में देश में पीने के पानी का ठीक से प्रबंधन न होने से बड़ी संख्या में पानी खराब हो रहा है। यह स्थिति तब जब दुनिया की करीब 17 प्रतिशत जनसंख्या भारत में रहती है,वहीं मीठे पानी की उपलब्धता यानी उसके स्त्रोत सिर्फ चार प्रतिशत ही मौजूद है।
अमृत मिशन 1.0: अवधि- 2015-16 से 2020-21 तक,
कुल स्वीकृत परियोजनाएं- 6008, कुल लागत- 83,463 करोड़।
79 हजार करोड़ के नाम पूरे हो चुके है। जबकि करीब चार हजार करोड़ भी लंबित है। वहीं केंद्र अब तक राज्यों को 34900 करोड़ की वित्तीय सहायता दे चुका है। इन परियोजनाओं में 43 हजार करोड़ की 1403 जलपूर्ति परियोजनाएं थी, जबकि 34 हजार करोड़ की 890 सीवरेज और सेप्टेज परियोजनाएं शामिल थी। वहीं तीन हजार करोड़ की 838 जल निकासी परियोजनाएं भी थी।
अमृत मिशन 1.0 में स्वीकृत प्रोजेक्ट और राशि
राज्य------------ कुल परियोजनाएं----------- लागत राशि (करोड़ में)
बिहार----------- 40---------------------- 2543
छत्तीसगढ़------- 114---------------------- 532427
दिल्ली---------- 19----------------------- 658
गुजरात---------266----------------------- 4885
हरियाणा------- 103----------------------- 2877
हिमाचल प्रदेश----49 ------------------------213
जम्मू-कश्मीर------53------------------------ 347
झारखंड-------- -24-------------------------- 1585
मध्य प्रदेश------- 84------------------------- 6410
पंजाब-----------20-------------------------- 2746
उत्तर प्रदेश------- 328----------------------11590
उत्तराखंड--------106------------------------ 575
पश्चिम बंगाल-------56------------------------ 3953
अमृत मिशन-2.0: अवधि- 2021-22 से 2025-26
कुल अनुमानित लागत 2.77 लाख करोड़,
हालांकि स्वीकृत परियोजनाएं- कुल 8791। लागत 1.93 लाख करोड़। अब तक 44 हजार करोड़ का काम ही पूरा हो पाया, जबकि 35 हजार करोड़ अब खर्च हुआ है। केंद्र सरकार ने अब तक 12,724 करोड़ ही जारी किए है। मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि कार्य की प्रगति के आधार पर वह पैसा जारी करते है।
राज्य---------अनुमोदित परियोजनाएं----------लागत राशि ( करोड़ में)
बिहार----------------39-----------------------8427
छत्तीसगढ़-----------50------------------------3007
दिल्ली---------------40----------------------5146
हरियाणा------------77-----------------------3823
हिमाचल प्रदेश-------19-------------------------309
जम्मू-कश्मीर--------68------------------------994
झारखंड़---------------18---------------------4066
मध्य प्रदेश-------------333-------------------12309
पंजाब------------------164-------------------3521
उत्तर प्रदेश-----------442----------------------26263
उत्तराखंड-------------27------------------------711
पश्चिम बंगाल----------211---------------------9792
अमृत मिशन का फंडिग पैटर्न: 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों को कुल परियोजना लागत का एक-तिहाई केंद्र देती है, जबकि 1 लाख से 10 लाख तक की आबादी वाले शहरों में परियोजना लागत की 50 प्रतिशत केंद्रीय सहायता दी जाती है। उत्तर-पूर्वी राज्य और हिमालयी राज्यों को इन राज्यों को 90 प्रतिशत केंद्र देती है, जबकि 10 प्रतिशत राज्य वहन करते है।
जल जीवन मिशन का फंडिग पैटर्न: हिमालयी और उत्तर पूर्वी राज्यों को परियोजना लागत का 90 प्रतिशत केंद्र देता है, जबकि 10 प्रतिशत राज्य देते है, वहीं बाकी राज्यों को परियोजना का आधा-आधा पैसा केंद्र और राज्य दोनों वहन करते है। |