सुंदरगढ़ में गड्ढे में गिरे हाथी को सुुरक्षित तरीके से बाहर निकालते वनकर्मी।
जागरण संवाददाता, राउरकेला। सुंदरगढ़ जिले में हाथी-मानव संघर्ष बीते कई वर्षों से गंभीर समस्या बना हुआ है। वन विभाग द्वारा हाथियों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए विभिन्न योजनाएं लागू किए जाने के बावजूद हाथियों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है। असुरक्षित जंगल, रेल और सड़क दुर्घटनाएं, बिजली का करंट, खाइयों व ट्रेंच में गिरने जैसे कारणों से पिछले सात वर्षों में जिले में 41 हाथियों की मौत दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष औसतन छह हाथियों की जान जा रही है। जिले के तीन वन मंडलों राउरकेला, बणई और सुंदरगढ़ में वर्तमान में कुल 192 हाथी विचरण कर रहे हैं। ये हाथी जहां एक ओर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, वहीं कई बार रिहायशी इलाकों में घुसकर घरों को भी क्षतिग्रस्त कर रहे हैं। इससे ग्रामीणों में भय का माहौल बना हुआ है। आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक हाथियों की मौत बणई वन मंडल में हुई है, जहां सात वर्षों में 19 हाथियों की जान गई है। राउरकेला वन मंडल में 18 जबकि सुंदरगढ़ वन मंडल में चार हाथियों की मौत हुई है। राउरकेला वन मंडल के बिरसा रेंज में वर्ष 2019 में ट्रेंच में गिरने से एक शावक हाथी की मौत हुई थी। उसी वर्ष बिरसा रेंज में दो तथा कांकी और पानपोष रेंज में एक-एक हाथी की मौत हुई। वर्ष 2020 में बिसरा रेंज के खइरटोला और कुआरमुंडा रेंज के कलुंगा क्षेत्र में एक-एक हाथी की मौत हुई। वर्ष 2021 में बिसरा रेंज के मोहीपानी इलाके में ट्रेन की चपेट में आने से एक नर और एक मादा हाथी की जान गई। 2022 में बांकी रेंज में दो और कुआरमुंडा रेंज में एक हाथी की मौत हुई। वर्ष 2024 में पानपोष रेंज में तीन और बांकी रेंज में एक हाथी की मौत दर्ज की गई। इसी वर्ष 24 अक्टूबर को बंडामुंडा स्टेशन के पास ट्रक की चपेट में आने से एक हाथी की जान चली गई।
बणई वन मंडल में पिछले पांच वर्षों में 18 हाथियों की मौत हुई है, जिनमें कोइड़ा रेंज में सात, तमड़ा में तीन, जरडा में पांच, बरसुआं में दो और बणई रेंज में एक हाथी शामिल है। सुंदरगढ़ वन मंडल में 2020 में हेमगिर रेंज में दो, 2022 में उज्ज्वलपुर में एक और 2025 में एक हाथी की मौत हुई है। जनवरी 2025 में राउरकेला वन मंडल के बांकी रेंज के कर्डा जंगल में तथा सितंबर में राजगांगपुर रेंज में ट्रेन की चपेट में एक मादा हाथी की मौत हुई। लगातार हो रही हाथियों की मौत ने वन्यजीव संरक्षण और सुरक्षा उपायों की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। |