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अरावली को नष्ट किया तो पीढ़ियों को भुगतना होगा खामियाजा, मोहन भागवत की दो टूक

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अरावली पर्वतमाला का उदाहरण देते हुए कहा कि अरावली को नष्ट किया तो पीढि़यों को इसका खामियाजा भुगतना होगा। स्पष्ट किया कि विकास जरूरी है, लेकिन वह प्रकृति को साथ लेकर ही टिकाऊ हो सकता है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

एम्स रायपुर में आयोजित युवा संवाद कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि दुनिया आज तक ऐसा विकास माडल नहीं बना पाई है, जिसमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो सके। डॉ. भागवत ने कहा कि अरावली पहाडि़यां केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन की रीढ़ हैं।
अरावली नष्ट होने पर पीढ़ियों को भुगतना होगा खामियाजा

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया। कहा कि अब समय आ गया है कि प्रकृति और विकास को टकराव की जगह समानांतर रास्ते पर चलाया जाए। ऐसी योजनाएं बनाई जाएं जिससे प्राकृतिक संसाधनों को किसी तरह का नुकसान न हो और विकास भी होता रहे।

युवाओं से संवाद करते हुए कहा कि रोजगार, करियर और आधुनिक सुविधाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। जीवनशैली और नीतियों, दोनों स्तर पर बदलाव की जरूरत है।

तीन दिवसीय दौरे के अंतिम दिन गुरुवार को युवाओं में बढ़ते अकेलेपन और नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि परिवारों में संवाद और भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होगा, तो युवा गलत रास्तों की ओर नहीं जाएंगे।
विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है

युवाओं से अपील की कि वे छोटे-छोटे फैसलों से पर्यावरण संरक्षण और समाज निर्माण की बड़ी शुरुआत करें।

बता दें कि केंद्र सरकार की सिफारिशों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की जिस परिभाषा को स्वीकार किया था, उसके अनुसार आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर (328 फीट) ऊंचे जमीन के हिस्से को ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा।

पर्यावरणविदों का कहना था कि सिर्फ ऊंचाई के आधार पर अरावली को परिभाषित करने से कई ऐसी पहाडि़यों पर खनन और निर्माण के लिए दरवाजा खुल जाने का खतरा पैदा हो जाएगा, जो 100 मीटर से छोटी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली परिभाषा पर फैसले पर रोक लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अरावली पहाडि़यों की परिभाषा से जुड़े अपने ही फैसले पर रोक लगा दी है। 29 दिसंबर 2025 को, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को स्थगित कर दिया और एक नई हाई-पावर कमिटी गठित करने का निर्देश दिया, जो अरावली रेंज का सर्वे करेगी और इसकी सही परिभाषा तय करेगी।

समिति गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में अरावली का अध्ययन करेगी, पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन करेगी और स्टेकहोल्डर्स से सलाह लेगी। अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी।
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