— राजेश पांडेय
एसआईआर की नई प्रक्रिया सामान्य लोगों के लिए कठिन है। एसएसआर में मौजूदा सूची में वोटरों के नाम जोड़े और काटे गए थे। लेकिन एसआईआर में सूचियां नए सिरे से बनी हैं। पहले पुनरीक्षण में बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर अपने रजिस्टर में मतदाताओं की संख्या और उनके ब्योरे की जांच करते थे। लेकिन एसआईआर के लिए अपूर्व तरीका अपनाया गया है। सभी वोटरों के लिए गणना फार्म भरने की समय सीमा एक माह तय की गई है। कुछ श्रेणी के वोटरों के लिए नागरिकता सहित कई अन्य दस्तावेज जमा करना जरूरी है।
भारतीय संविधान की धारा 326 के अनुसार लोकसभा और हर राज्य की विधानसभा के लिए चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। प्रत्येक व्यक्ति जो भारत का नागरिक है और 18 वर्ष की आयु का है, उसे चुनाव में वोटर के बतौर दर्ज होने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट अपने कई फैसलों में इस अधिकार का जिक्र कर चुका है। लेकिन, इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव में लगभग 27 लाख वोटर मतदान नहीं कर पाएंगे। यह स्थिति असाधारण है। देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की अवधारणा पर गंभीर आघात है। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत नई वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया ने कई सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट भी मतदान के संवैधानिक हक की रक्षा के लिए अब तक निर्णायक कदम नहीं उठा सका है।
चुनाव आयोग ने हर साल और चुनाव पूर्व होने वाले विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसएसआर) की बजाय 27 अक्टूबर 2025 को बंगाल सहित 12 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर कराने की घोषणा की थी। पिछले साल बिहारमें विधानसभा चुनाव से सिर्फ पांच माह पहले एसआईआर कराने पर विवाद उठे थे। मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सर्वोच्च अदालत के कहने पर आयोग ने आधार कार्ड को पहचान के दस्तावेजों में शामिल करने सहित कुछ सुधार किए थे। कोर्ट ने चुनाव से पहले एसआईआर की विवादित प्रक्रिया को रोकने की जरूरत नहीं समझी थी। बंगाल के हालात तो बेहद चिंताजनक और विवादास्पद हैं।
एसआईआर की नई प्रक्रिया सामान्य लोगों के लिए कठिन है। एसएसआर में मौजूदा सूची में वोटरों के नाम जोड़े और काटे गए थे। लेकिन एसआईआर में सूचियां नए सिरे से बनी हैं। पहले पुनरीक्षण में बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर अपने रजिस्टर में मतदाताओं की संख्या और उनके ब्योरे की जांच करते थे। लेकिन एसआईआर के लिए अपूर्व तरीका अपनाया गया है। सभी वोटरों के लिए गणना फार्म भरने की समय सीमा एक माह तय की गई है। कुछ श्रेणी के वोटरों के लिए नागरिकता सहित कई अन्य दस्तावेज जमा करना जरूरी है।
बंगाल में दूसरे राज्यों से अलग हटकर प्रक्रिया अपनाई गई है। वहां तार्किक विसंगतियों के नाम पर प्रक्रिया को पेचीदा बना दिया है। यह बदलाव संदेह और सवालों का घेरा खड़ा करता है। चुनाव आयोग का मानना है कि जो वोटर नई सूची में इस वक्त नहीं हैं, उनका या तो 2002-03 की सूचियों से संबंध साबित नहीं हुआ है या उनके मामलों में कुछ तार्किक विसंगतियां हैं। तार्किक विसंगतियों को पांच कैटेगरी में बांटा गया है, इनमें नाम की वर्तनी में अंतर, माता-पिता और वोटर की आयु के बीच अंतर, एक ही परिवार या पूर्वज से जुड़े छह से अधिक लोग जैसे बिंदु शामिल हैं। नतीजतन कुछ परिवारों के कई सदस्य तो सूची में हैं जबकि कुछ बाहर कर दिए गए हैं।
बंगाल के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच की 13 अप्रैल को गई टिप्पणियों पर गौर करना जरूरी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व की खंडपीठ के जस्टिस जोयमाल्या बागची ने कहा कि ‘ जिस देश में आपका जन्म हुआ है,वहां वोटर लिस्ट में रहना और मताधिकार न केवल संवैधानिक बल्कि भावनात्मक भी है। एक लोकतांत्रिक सरकार चुनने की प्रक्रिया में आपकी हिस्सेदारी नागरिकता और राष्ट्रभक्ति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि मूल एसआईआर में 2002 की सूचियों में शामिल लोगों की जांच का प्रावधान नहीं था। उन्होंने कहा कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में जीत का मार्जिन 2 फीसदी है और 10 फीसदी वोटर हटाए गए हैं तो हम ऐसे मामलों की जांच करेंगे’। कोर्ट ने उन वोटरों को मतदान की अनुमति दे दी है जिन्हें ट्रिब्यूनल की हरी झंडी मिल गई है। बहरहाल, उन 27 लाख वोटरों में से अधिकतर लोगों को राहत मिलने की उम्मीद नहीं है जिनके नाम कटे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक 17 अप्रैल तक बंगाल की मतदाता सूचियों में एक भी नाम नहीं जुड़ा था। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एक कांग्रेस प्रत्याशी सहित दो लोगों के नाम जुड़े थे।
सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की प्रक्रिया में तमाम पेचीदगियों के बावजूद उसे सही ठहराया है। कोर्ट मानता है कि मूल एसआईआर में 2002 की सूचियों की जांच का प्रावधान नहीं था। फिर भी, उसे रोकने की जरूरत नहीं समझी गई है। इन सुझावों पर गौर नहीं किया गया है कि जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहां प्रक्रिया को चुनाव नतीजे आने तक स्थगित कर दिया जाए। सवाल है,अगर ऐेसे राज्यों में कुछ माह बाद एसआईआर होती तो क्या फर्क पड़ जाता। आयोग इतनी जल्दबाजी क्यों कर रहा है? 2002 की एसआईआर 12-13 माह में पूरी हुई थी। अब इस काम को पांच माह में निपटाने की क्या जरूरत है?
आयोग ने एसआईआर की समयसीमा पर जताई गई तमाम आपत्तियों को नजरअंदाज किया है। उसने अपने अंदरूनी सिस्टम से आए सुझावों की अनदेखी की है। इंडियन एक्सप्रेस में 12 अप्रैल को प्रकाशित खबर के अनुसार महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) एस चोकलिंगम ने 25 नवंबर 2025 को आयोग को लिखे एक पत्र में कहा कि प्रक्रिया पूरी करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। वैसे, महाराष्ट्र उन 12 राज्यों में नहींं है जहां एसआईआर हुई है। आयोग ने एसआईआर पर राज्यों की राय मांगी थी। पत्र में उल्लेख है कि महाराष्ट्र में नवंबर 2001 से दिसंबर 2002 के बीच यह काम हुआ था। इसके पीछे वोटरों के नाम काटने का नहीं बल्कि सूची को संशोधित करने का आइडिया है। लिहाजा, इस उद्देश्य के लिए आवश्यक समय दिया जाना चाहिए। पत्र में वोटरों के मौजूदा डेटा का पिछली एसआईआर के डेटा से मिलान करने पर भी सवाल उठाया है। लिखा है, इस काम में ज्यादा समय लगता है और यह चुनाव आयोग की गाइडलाइन में भी शामिल नहीं है।
महाराष्ट्र के सीईओ का
पत्र ही चुनाव आयोग की नीयत को जांच के दायरे में लाता है। लगता है, एसआईआर का मकसद वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा बनाने की बजाय वोटरों के नाम काटने का है। लेकिन चुनाव आयोग बेरोकटोक अपने हिसाब से काम कर रहा है। उसे अहसास है कि मौजूदा दौर में उसकी जवाबदेही तय करना बेहद मुश्किल है। चुनाव आयुक्तों के चयन का तरीका और उनके अधिकार बताते हैं कि वे अपने तरीके से काम करते रहेंगे और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा संसद में पेश महाभियोग प्रस्ताव का हश्र इशारा करता है कि उन्हें सत्ताधारी दल की तरफ से अभयदान मिला है। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी है। दोनों सदनों में चर्चा और मतदान की नौबत तक नहीं आने दी गई। अगर प्रस्ताव को आगे बढऩे की इजाजत मिलती तो संसद की जांच समिति बनती, रिपोर्ट आती, उस पर चर्चा होती। इससे भविष्य के लिए अच्छी मिसाल बन सकती थी। लेकिन, ऐेसा नहीं होने दिया गया है। मौजूदा एसआईआर देश में लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। हमारे राजनेता भारत के दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने पर गर्व करते नहीं थकते हैं। लेकिन, अब उसकी प्रतिष्ठा, गरिमा और पवित्रता खतरे में है। उसकी रक्षा करने वाली संवैधानिक संस्थाएं और तंत्र यह सब होते हुए देख रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Deshbandhu Desk
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