काशी में मसान की होली पर गहराया विवाद, डोमराजा परिवार भी विरोध में आया।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। मसाने की होली खेलने वाले ना तो दिगंबर के भाव में नजर आते हैं और ना ही वह भूत पिशाच ही होते हैं। नई परंपरा जो कुछ वर्ष पूर्व डाली गई वह इस बार लग रहा है कि विरोध की भेंट चढ़ जाएगी। वैसे तो काशी में मान्यता है कि जीव को मसान की होली शिव बना देती है। लेकिन इन भावों के बीच काशी विद्वत परिषद के साथ ही अन्य संस्थाएं और खुद डोमराजा परिवार भी विरोध में आ गया है।
जीवन और मृत्यु को समान भाव से स्वीकार करने वाली काशी में देवस्थान और महाश्मशान का महात्म्य एक समान माना जाता है। 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी है। इसके अगले दिन फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को मणिकर्णिका घाट पर पारंपरिक ‘मसान की होली’ खेली जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव भस्मांगरागाय महेश्वर रूप में अपने गणों के साथ चिता भस्म से फाग रचाते हैं।
दोपहर के समय महाश्मशान में राग-रागिनियों के बीच भस्म की होली का अनोखा दृश्य देखने को मिलता है। इसमें काशी ही नहीं, देश-विदेश से आए श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं। भक्त अपने इष्ट के साथ भस्म की होली खेलकर स्वयं को शिवमय अनुभव करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, विवाह के समय भगवान शिव अपने गणों को गौने की बरात में साथ नहीं ले गए थे। इससे गणों के मन में टीस रह गई। उसे दूर करने के लिए उन्होंने मणिकर्णिका पर गणों के साथ चिता भस्म की होली खेली। इसी परंपरा को मसाननाथ महादेव मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने 2009 में प्रारंभ किया। तब से यह आयोजन हर वर्ष भव्य होता जा रहा है।
इस वर्ष मसान की होली पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। कुछ शास्त्रज्ञ इसे अशास्त्रीय मानते हैं, लेकिन काशीवासियों की आस्था और उत्साह ने मसान की होली को विश्वस्तरीय पहचान दिला दी है। डोमराजा परिवार ने भी इस परंपरा पर रोक लगाने की बात कही है, जिससे स्थानीय समुदाय में चिंता और विरोध के स्वर उठने लगे हैं।
डोमराजा परिवार का कहना है कि यह आयोजन धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है और इसे रोकना चाहिए। दूसरी ओर, काशी के भक्त और श्रद्धालु इस परंपरा को अपने सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा मानते हैं। उनका मानना है कि मसान की होली न केवल शिव की आराधना का एक तरीका है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु के चक्र को स्वीकार करने का भी प्रतीक है।
इस विवाद ने काशी में मसान की होली के आयोजन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। भक्तों का कहना है कि इस परंपरा को रोकने का प्रयास काशी की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करेगा। वहीं, डोमराजा परिवार के समर्थक इसे धार्मिक अनुशासन के रूप में देख रहे हैं। बताया कि यह परंपरा अनुचित है। ऐसे में काशी में इस बार चिता भस्म की होली का दौर होगा भी कि नहीं और विरोध के स्वर कितने ऊंचे होंगे यह चर्चा का विषय बना हुआ है।
मसान की होली का आयोजन इस वर्ष विवादों में घिर गया है। इस वर्ष की मसान की होली का आयोजन न केवल काशी के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। सभी की नजरें इस परंपरा के भविष्य पर टिकी हुई हैं। क्या यह आयोजन अपनी परंपरा को बनाए रख पाएगा, या इसे रोकने की कोशिशें सफल होंगी, यह देखना दिलचस्प होगा। हालांकि चर्चा और आरोप प्रत्यारोप का दौर काफी पर्यटकों को भी असमंजस में डाले हुए है।  |
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