उत्तर भारत में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से कमजोर पड़ रहे पश्चिमी विक्षोभ। (AI Generated Image)
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। उत्तर भारत में इस साल सर्दियों के दौरान मौसम का मिजाज काफी बदला-बदला नजर आया। पहाड़ों से लेकर मैदानों तक वर्षा और बर्फबारी में भारी कमी दर्ज की गई है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार इस स्थिति का मुख्य कारण \“\“पश्चिमी विक्षोभ\“\“ का कमजोर पड़ना है।
पहाड़ों पर बर्फबारी और मैदानों में वर्षा का संकट
आमतौर पर दिसंबर और जनवरी में पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में भारी बर्फबारी और उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानी इलाकों में अच्छी वर्षा होती है। लेकिन इस साल जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में सामान्य से काफी कम वर्षा और बर्फबारी हुई है। दिल्ली, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में भी स्थिति अच्छी नहीं रही।
क्या है इसका वैज्ञानिक कारण
मौसम विभाग के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस सीजन में आए अधिकांश पश्चिमी विक्षोभ बहुत कमजोर थे। ये विक्षोभ भूमध्य सागर से नमी लेकर चलते हैं, लेकिन इस बार \“\“सबट्रापिकल वेस्टरली जेट स्ट्रीम\“\“ की स्थिति में बदलाव के कारण इनका प्रभाव उत्तर-पश्चिम भारत पर कम रहा।
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जेट स्ट्रीम अपनी सामान्य स्थिति से खिसक कर उत्तर-पूर्व की ओर चली गई, जिससे विक्षोभ सक्रिय नहीं हो पाए।
प्रदूषण और कोहरे पर असर
वर्षा नहीं होने का सीधा असर वायु गुणवत्ता पर भी पड़ा। पर्याप्त वर्षा की कमी के कारण वातावरण में मौजूद प्रदूषक तत्व धूल नहीं पाए, जिससे दिल्ली और एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत में स्मग एवं प्रदूषण का स्तर खतरनाक बना रहा।
साथ ही नमी और ठंडी हवाओं के अभाव में इस साल कड़ाके की ठंड के दिनों में भी कमी देखी गई। इस बार सर्दियों में नवंबर एवं दिसंबर के बाद फरवरी भी सूखा बीत रहा है।
जलवायु परिवर्तन का संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा, तो भविष्य में पश्चिमी विक्षोभ की तीव्रता व आवृत्ति में और गिरावट आ सकती है। हालांकि इसे फिलहाल मौसम के प्राकृतिक बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है, लेकिन विज्ञानी इस पर करीब से निगरानी रख रहे हैं।
आलम यह है कि मानसून में वर्षा अब अक्टूबर तक चलती है तो कड़ाके की सर्दी अपना एहसास दिसंबर के उत्तरार्ध या जनवरी के पूर्वार्द्ध में ही करा पाती है। रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं के लिए यह वर्षा खासी महत्वपूर्ण होती है और इसकी कमी भविष्य में कृषि उत्पादन को भी प्रभावित कर सकती है।
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