उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की फाइल फोटो।
राज्य ब्यूरो, जागरण, प्रयागराज। उत्तर प्रदेश सचिवालय में कार्यरत अपर निजी सचिवों (एपीएस) की पदोन्नति को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की अपर निजी सचिव भर्ती-2010 से चयनित अधिकारियों की पदोन्नति के मामले में सचिवालय प्रशासन विभाग ने महाधिवक्ता से विधिक राय मांगी है। यह कदम तब उठाया गया है जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 23 अपर निजी सचिवों को मुख्यालय तलब कर पूछताछ शुरू की है।
सीबीआइ ने प्राथमिकी दर्ज की थी
वर्ष 2017 में योगी सरकार ने आयोग की कुछ भर्तियों की सीबीआइ जांच कराने का निर्णय लिया था। प्रारंभिक जांच के बाद 4 अगस्त 2021 को सीबीआइ ने आयोग के तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक प्रभुनाथ समेत अज्ञात कर्मचारियों और बाहरी व्यक्तियों के खिलाफ चयन प्रक्रिया में कथित धोखाधड़ी के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की थी।
कथित रूप से धोखाधड़ी से नौकरी पाने का आरोप है
जांच प्रचलित रहने के बावजूद सचिवालय प्रशासन विभाग ने चयनित अपर निजी सचिवों का स्थायीकरण कर वरिष्ठता सूची जारी कर दी और उन्हें निजी सचिव पद पर पदोन्नत करने की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी। इसी बीच प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने 32 ऐसे अपर निजी सचिवों के नाम सार्वजनिक करने का दावा किया है, जिन पर कथित रूप से धोखाधड़ी से नौकरी पाने का आरोप है।
समिति के अध्यक्ष ने की मांग
समिति के अध्यक्ष अवनीश पाण्डेय और मीडिया प्रभारी प्रशांत पाण्डेय ने विभाग के समक्ष आपत्ति दर्ज कराते हुए मांग की है कि सीबीआइ जांच पूरी होने तक पदोन्नति प्रक्रिया रोकी जाए। सीबीआइ द्वारा 23 अधिकारियों को तलब किए जाने के बाद सचिवालय प्रशासन विभाग ने महाधिवक्ता को भेजी पत्रावली में इन नामों के साथ समिति द्वारा उजागर 32 नामों की सूची भी संलग्न की है।
संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने लगाया आरोप
अब महाधिवक्ता की राय के बाद ही आगे की कार्रवाई तय होने की संभावना है। संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने मामले में छात्रों का पक्ष जाने बिना जांच के दायरे में आए चयनितों को बचाने का प्रयास किए जाने का आरोप लगाया है। |
|