बाबा बैद्यनाथधाम मंदिर देवघर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़।
आरसी सिन्हा, देवघर। द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक बाबा बैद्यनाथ सबको मनोवांछित फल देते हैं। फाल्गुन मास चतुर्दशी का पावन दिन है। आज शिव-पार्वती विवाहोत्सव है। परिणय बंधन में बंधने की रस्मों रिवाज महाशिवरात्रि की रात को पूरी होती है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक बाबा बैद्यनाथ झारखंड के देवघर में विराजते हैं। यहां की हर परंपराएं अनूठी है। जो देश के किसी ज्योतिर्लिंग से अलग करती है। महाशिवरात्रि से एक दिन पहले हर साल मंदिर के शिखर पर पंचशूल को स्थापित करने से पहले प्राण प्रतिष्ठा की जाती है।
शनिवार को पंचशूल की प्राण-प्रतिष्ठा की पूजा सरदार पंडा गुलाबनंद ओझा ने किया। शिवरात्रि से दो दिन पहले पंचशूल को मंदिर के शिखर से उतारा गया था। दुनिया में ऐसा कोई भी शिव मंदिर नहीं है जहां शादी-ब्याह के रस्म के बाद शिवलिंग पर सिंदूर अर्पित किया जाता है।
बसंत पंचमी को तिलकोत्सव कर शुरू हुआ रस्म
बसंत पंचमी के दिन से ही बाबा मंदिर में रस्म शुरू हो जाता है। मिथिलावासी यहां आकर तिलक चढ़ाते हैं। बाबा मंदिर स्टेट की ओर से तिलक चढ़ाने की पूरी परंपरा निभाने के बाद पुरोहित बाबा बैद्यनाथ ज्याेतिर्लिंग पर अबीर चढ़ाते हैं। इसके बाद मिथिला में फाल्गुन तक अबीर उड़ता है।
त्रेता युग से शुरू हुई बाबा बैद्यनाथ मंदिर की परंपरा का निर्वहन हर युग में उसी अनुरूप की जाती है। द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक देवघर ही एकमात्र तीर्थस्थल है जहां शिव और शक्ति एक साथ विराजमान हैं। यहां सती के हृदय पर बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है। यह हृदय स्थल कहा जाता है।
शिव-शक्ति स्थल होने के कारण महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां चार प्रहर की पूजा में चार बार ज्योतिर्लिंग पर सिंदूर अर्पित होता है। गुलाब फूल से तैयार दो माला अर्पित होता है। धोती-साड़ी शादी के रस्म में चढ़ाया जाता है। इस दरबार में गठबंधन की परंपरा है। यह अनूठी परंपरा किसी दूसरे ज्योतिर्लिंग स्थल पर नहीं होती है।
चार बार होती षोड़षोपचार पूजा
मंदिर के इस्टेट पुरोहित श्रीनाथ पंडित ने बताया कि त्रेता युग से बाबा मंदिर की यह परंपरा चली आ रही है। साल में यह पहला अवसर होता है जब पूरी रात चार पहर की पूजा होती है। वैदिक रीति से चार बार षोड़षोपचार पूजा होती है। ज्योतिर्लिंग को गंगाजल, गुलाब जल, केवड़ा के जल, दूध, घी, गन्ना, शक्कर से स्नान कराया जाता है। उपटन और हल्दी का लेप लगाया जाता है। और चारों पहर की चार पूजा में चार बार शिवलिंग के उपर सिंदूर अर्पण हाेता है।
पंचशूल के दर्शन से पूरी होती कामना
पंच तत्व का प्रतीक पंचशूल के दर्शन मात्र से भक्तों की हर मनोरथ पूरी होती है। महाशिवरात्रि से दो दिन पहले बाबा मंदिर और पार्वती मंदिर के गुंबद पर लगे पंचशूल को उतारा जाता है। परंपरा के मुताबिक शिवरात्रि से एक दिन पहले त्रयोदशी की पावन बेला में पंचशूल की प्राण प्रतिष्ठा होती है।
परंपरा के तहत मंदिर के दीवान सोना सिन्हा मलमल के कपड़े पर मंत्र लिखते हैं। जिससे पंचशूल को ढका जाता है। इसके बाद शिखर पर स्थापित करने की परंपरा आज भी हो रही है। मंदिर स्टेट की ओर से पहला गठबंधन चढ़ाने की परंपरा भी वर्षों से चली आ रही है।
-------------- |
|