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बोर्ड परीक्षा के दौरान कैसे रहें टेंशन फ्री? डॉक्टरों ने छात्रों और अभिभावकों के लिए दी जबरदस्त टिप्स

Chikheang 3 hour(s) ago views 383
  

बोर्ड परीक्षा की तैयारी करने की टिप्स। फाइल फोटो



जागरण संवाददाता, पटना। 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं नजदीक आते ही लाखों घरों में तनाव की आहट सुनाई देने लगती है। विद्यार्थियों के लिए यह जीवन का बड़ा पड़ाव माना जाता है, तो अभिभावकों के लिए भविष्य की चिंता का समय।

मनोचिकित्सकों का कहना है कि यह परीक्षा जितने अंकों की है, उतनी ही मानसिक संतुलन और भावनात्मक सहयोग की भी है। इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के प्राध्यापक डॉ. केके सिंह, पीएमसीएच के मनोचिकित्सक डॉ. एनपी सिंह ने बताया कि हल्का तनाव प्रदर्शन को बेहतर बनाता है, लेकिन जब एकाग्रता तोड़ने लगे, नींद छीन ले या आत्मविश्वास कमजोर कर दे तो उसे संभालना जरूरी हो जाता है।

उन्होंने कहा कि पूरी किताब को एक साथ देखकर घबराने के बजाय पढ़ाई को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटें। हर छोटे लक्ष्य की पूर्ति दिमाग में ‘डोपामाइन’ का स्राव करती है, जो प्रेरणा और संतोष की भावना देता है।
विद्यार्थियों के लिए विशेषज्ञों की सलाह

छोटे लक्ष्य तय करें: पूरे सिलेबस को एक साथ देखने के बजाय दिन को छोटे टॉपिक में बांटें।

तुलना से बचें: दोस्त ने कितना पढ़ लिया, इस सोच आत्मविश्वास गिराती है। हर छात्र की सीखने की गति अलग होती है।

नींद और संतुलित आहार: 6-7 घंटे की नींद जरूरी है। थका हुआ दिमाग जानकारी को लंबे समय तक याद नहीं रख पाता।नियमित ब्रेक लें: हर 30-40 मिनट की पढ़ाई के बाद 5-10 मिनट का ब्रेक लें। इस दौरान फोन से दूर रहकर स्ट्रेचिंग या हल्की वाक करें।
अभिभावकों के लिए भी चेतावनी

डॉ. निश्का सिन्हा बताती हैं कि कई बार माता-पिता की चिंता बच्चों पर दबाव बनकर गिरती है। बच्चा पहले से ही परीक्षा को लेकर डरा होता है, ऐसे में अपेक्षाओं का बोझ उसे भीतर से तोड़ सकता है। कहा कि अंक ही सब कुछ नहीं है।

बोर्ड के नंबर भविष्य का एक रास्ता तय कर सकते हैं, लेकिन वे बच्चे की पूरी काबिलियत का पैमाना नहीं हैं। ऐसे में अभिभावकों की ओर से किया गया तुलना कष्टदायी होता है।

“पड़ोस के लड़के को देखो” जैसे वाक्य आत्मविश्वास को चोट पहुंचाते हैं। हर बच्चा अपनी विशिष्टता के साथ आगे बढ़ता है। इसको देखते हुए हमेशा घर का माहौल सकारात्मक रखें।

छोटी-छोटी बातों पर डांटने के बजाय प्रयास की सराहना करें। उन्होंने कहा कि बच्चों से पहले सुनें, फिर सलाह दें, क्योंकि कई बार बच्चे को समाधान नहीं, सिर्फ एक सुनने वाला चाहिए होता है। इसका बेहतर परिणाम भी देखने को मिलता है।

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