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एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल बना रहा ‘साइलेंट पेंडेमिक’, पांच ‘राइट्स’ अपनाकर रोकी जा सकती है AMR की रफ्तार

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उत्तरांचल इंस्टीट्यूट आफ फार्मास्युटिकल साइंसेज में एएमआर जागरुकता कार्यक्रम. Jagran



जागरण संवाददाता, देहरादून। दैनिक जागरण के एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) जागरुकता अभियान के तहत शुक्रवार को प्रेमनगर स्थित उत्तरांचल इंस्टीट्यूट आफ फार्मास्युटिकल साइंसेज, उत्तरांचल विवि के सभागार में कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें ग्राफिक एरा हास्पिटल के वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डा. मानिक राणा ने फार्मेसी के छात्र-छात्राओं को एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के खतरों और बचाव के उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

कार्यक्रम की शुरुआत संस्थान के डीन डा. विकास जखमोला ने डा. राणा का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत कर की। कार्यक्रम के दौरान छात्रों ने सवाल पूछे कि क्या पोल्ट्री, डेयरी उत्पाद या सब्जियों के माध्यम से भी रेजिस्टेंस का असर शरीर में पहुंच सकता है। इस पर डा. राणा ने बताया कि एक्सपायरी दवाओं को लापरवाही से फेंकने और एंटीबायोटिक के अंधाधुंध उपयोग से पर्यावरण प्रभावित होता है, जिसका असर अंततः मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है।

15–20 साल में महामारी बन सकता है एएमआर
डा. मानिक राणा ने कहा कि एएमआर आने वाले 15–20 वर्षों में वैश्विक महामारी का रूप ले सकता है। यह समस्या अब चिकित्सकों के सामने स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी है। उन्होंने बताया कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैल सकती है। उन्होंने एएमआर के प्रमुख कारणों में बिना डाक्टर की सलाह के केमिस्ट से एंटीबायोटिक खरीदकर सेवन करना बताया। साथ ही फार्मा इंडस्ट्री के अपशिष्ट पदार्थों के सही निस्तारण न होने को भी एक बड़ा कारण बताया, जो पानी, मिट्टी और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंच सकता है।

एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के तीन प्रमुख मैकेनिज्म
डा. राणा ने बताया कि किसी भी एंटीबायोटिक के प्रति बैक्टीरिया तीन तरीकों से रेजिस्टेंस विकसित करते हैं। पहला कुछ बैक्टीरिया एंजाइम बनाकर एंटीबायोटिक दवाओं को निष्क्रिय या डिग्रेड कर देते हैं। दूसरा बैक्टीरिया अपनी सेल वाल में बदलाव कर दवा को अंदर प्रवेश करने से रोक देते हैं। तीसरा कुछ बैक्टीरिया दवा को कोशिका के भीतर से बाहर निकालने की क्षमता विकसित कर लेते हैं।

फार्मेसिस्ट निभाएं ‘सिपाही’ की भूमिका
उन्होंने कहा कि फार्मेसी के छात्र भविष्य में फार्मासिस्ट के रूप में एएमआर के खिलाफ सिपाही की भूमिका निभा सकते हैं। प्रिस्क्रिप्शन को ध्यान से पढ़ना, मरीज की काउंसलिंग करना और दवा का पूरा कोर्स लेने के लिए प्रेरित करना बेहद जरूरी है।
फार्मासिस्ट के लिए ‘पांच राइट्स’

  • राइट पेशेंट – सही मरीज को ही दवा मिले।
  • राइट ड्रग – बीमारी के अनुसार सही दवा दी जाए।
  • राइट डोज – उम्र, वजन और स्वास्थ्य के अनुसार उचित मात्रा।
  • राइट ड्यूरेशन – निर्धारित अवधि तक पूरा कोर्स।
  • राइट रूट – दवा देने का सही तरीका।


दैनिक जागरण द्वारा चलाए गए जागरुकता अभियान से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला, जैसे कि हमें कभी भी दवाओं का ओवरडोज नहीं लेना चाहिए। साथ ही बिना डाक्टर की परामर्श के किसी तरह की कोई दवा नहीं लेनी चाहिए । एंटीबायोटिक्स का बिना परामर्श के जो सेवन हो रहा है, अगर उसे समय पर नहीं रोक गया तो एक गंभीर समस्या का रूप लेने में ज्यादा समय नहीं लगेगा ।- सुलताना परवीन छात्रा बी-फार्मा तृतीय वर्ष

एएमआर भारत में एक बहुत ही बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है , और ये समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है । इस अभियान के जरिए हमने एएमआर को बढ़ावा देने के कारण जाने साथ ही इससे कैसे बचा जाए ये सब जाना। हम ना केवल खुद को इसके लिए तैयार करना है बल्कि हमसे जुड़े सभी लोगों के बीच ये जागरूकता लानी है कि बिना डाक्टर की सलाह की दवा न लें और एंटीबायोटिक्स का बिना सही जानकारी के सेवन ना करें । - कौशल मंडल छात्र बी- फार्मा तृतीय वर्ष

मैं दैनिक जागरण का तहे दिल से धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने हमें ओर हमारे सभी छात्र छात्राओं को ये जानकारी दी, जो कि भविष्य में बहुत मददगार साबित होगी । हम इस जानकारी को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखेंगे जितना हो सकेगा उतना सभी लोगों को एएमआर जैसी समस्या के लिए जागरूक किया जाएगा ।
- शालू वर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, फार्मास्यूटिक्स, यूआइपीएस

जिस तरह से हम लोग बिना डॉक्टर की परामर्श के बिना जानकारी के एंटीबायोटिक का सेवन करते है ,उससे हमारे शरीर में रेजिस्टेंस की समस्या का सामना करना पड़ सकता है , यानी बीमारी पर दवाई का असर ना होना , और ये समस्या भारत में कुछ सालों बाद एक पेंडेमिक के रूप मे सामने आ सकती है । इससे बचने के लिए हमें बिना जानकारी या बिना डॉक्टर की परामर्श के किसी भी तरह की कोई दवाई या एंटीबायटिक का सेवन रोकना होगा । - डा. विकास जखमोला, डीन, उत्तरांचल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेज, उत्तरांचल यूनिवर्सिटी


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