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देश में 80 प्रतीशत मौतों के सही कारण का नहीं चल पाता है पता। (AI Generated Representational Image)
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। देश में हर साल होने वाली कुल मौतों में से केवल 20 प्रतिशत के करीब मामलों में ही मृत्यु के कारणों से जुड़ी क्लीनिकल जानकारी उपलब्ध हो पाती है, शेष 80 प्रतिशत मौत के वास्तविक कारण स्पष्ट नहीं हो पाते।
विशेषज्ञों ने इसे भारत की स्वास्थ्य नीति के लिए गंभीर चुनौती मानते हैं। साथ ही देश की स्वास्थ्य नीति की बेहतरी के लिए इस सूचना अभाव को दूर करने के लिए वर्बल एटाप्सी जैसी व्यवस्था को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता पर बल देते हैं।
इन्हीं मुद्दों को लेकर नीति आयोग से लेकर देश भर के स्वास्थ्य एवं अन्य विषयों के विशेषज्ञों ने दो दिन तक गहन मंथन किया। यह मंथन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली के इंटरनल मेडिसिन विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में किया गया।
रिपोर्टिंग सुदृढ़ करना लक्ष्य
इस संगोष्ठी के संयोजक डा. हर्षल साल्वे रहे। आयोजन का उद्देश्य देश की मृत्यु सूचना प्रणाली और मृत्यु-कारण रिपोर्टिंग व्यवस्था को सुदृढ़ करना था। संगोष्ठी का उद्घाटन नीति आयोग के सदस्य डा. विनोद के. पाल ने किया।
अपने संबोधन में उन्होंने कहाकि सटीक, पारदर्शी और विश्लेषणात्मक साक्ष्य आधारित मृत्यु डाटा शासन के लिए अनिवार्य है। उन्होंने जोर दिया कि हर मृत्यु दर्ज हो और हर मृत्यु का कारण पहचाना जाए, तभी विकसित भारत की परिकल्पना साकार हो सकती है।
संगोष्ठी में भाग लेने आए प्रतिभागी। फोटो सौजन्य- एम्स
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भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण ने कहाकि देश में सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम को लगातार डिजिटल रूप से मजबूत किया जा रहा है, ताकि मृत्यु से जुड़ा डाटा अधिक सुलभ, समयबद्ध और नीति निर्धारण के योग्य बन सके
सीआरएस, एमसीसीडी और डिजिटल एकीकरण पर जोर
संगोष्ठी में सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस), मेडिकल सर्टिफिकेशन आफ काज आफ डेथ (एमसीसीडी) और मृत्यु से जुड़े डाटा के डिजिटल एकीकरण पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि देश में बड़ी संख्या में मौतें अस्पतालों के बाहर होती हैं, जहां न तो चिकित्सकीय परीक्षण हो पाता है और न ही एमसीसीडी उपलब्ध हो पाता है। ऐसे मामलों में वर्बल एटाप्सी के जरिए परिजनों से मृत्यु से पहले के लक्षणों और परिस्थितियों की जानकारी लेकर मौत के संभावित कारण तय किए जा सकते हैं।
विदेशी डाटा से आगे बढ़ने की आवश्यकता
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के महानिदेशक डा. राजीव बहल ने कहाकि भारत की स्वास्थ्य नीतियां लंबे समय तक विदेशी डाटा और वैश्विक अनुमानों पर निर्भर रही हैं। अब समय आ गया है कि स्वदेशी नीति के लिए स्वदेशी और भरोसेमंद डाटा तैयार किया जाए।
NoteBookLM आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस प्रोग्राम की सहायता से बनाया गया ग्राफिक्स।
संगोष्ठी में डा. आनंद कृष्णन, डा. राखी डंडोना, डा. रोहिणी जोशी, डॉ हर्षल रमेश सालवे, डॉ राकेश कुमार और एम्स के फैकल्टी मेंबर्स, अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय के पदाधिकारी ने भी भाग लिया।
विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहाकि वर्बल एटाप्सी को सीआरएस और एमसीसीडी से जोड़कर ही देश में मृत्यु कारणों की वास्तविक तस्वीर सामने लाई जा सकती है, जिससे स्वास्थ्य संसाधनों का बेहतर उपयोग और प्रभावी नीति निर्माण संभव होगा।
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