विनोद मिश्रा-
अगस्त 1992 में पुलिस सेवा में आने के बाद 31मई 2024 को लगभग 32 वर्षों के अथक परिश्रम पर विराम लगा। परिवार, विभाग एवं समाज के श्रेष्ठ जनों के आशीर्वाद, मित्रों और शुभेक्षुओं की शुभकामनाओं के फलस्वरूप सकुशल सेवा निवृत्ति का चिरप्रतीक्षित निर्धारित दिवस आ ही गया। पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश और भ्रष्टाचार निवारण संगठन के सहकर्मियों द्वारा औपचारिक भावभीनी विदाई की गई।
सम्पूर्ण सेवाकाल में अपने जुनून को साथ लेकर कार्य करते हुए बचपन से पाले हुए अरमानों को पूरा करने में जितनी संतुष्टि प्राप्त हुई, उसे शब्दों में बांधना बहुत कठिन है। समाज में दृष्टिगत अपराध, अन्याय और अत्याचार से जो मानसिक उद्वेग और व्यग्रता होती है, उसकी परिशांति के लिए पुलिस सेवा से बेहतर कोई सेवा मुझे समझ में नहीं आती। प्रत्येक व्यक्ति जब किसी सेवा में आता है तो उसका अपना स्वयं का एक प्रतिमान और उद्देश्य रहता है। मेरा पथ मैंने स्वयं चुना था और इसके पीछे मेरी सोच यही थी कि कोई वैरागी यदि समाज का त्याग करके आध्यात्मिक साधना करने जाता है तो वह सामाजिक विसंगतियों से दूर होकर गेरुआ वस्त्र में अपनी साधना में एकाग्र होता है किंतु एक पुलिस कर्मी खाकी वस्त्र में अपने परिवार से पहले समाज की जिम्मेदारी कानून की परिधि में लेकर अधिक कठिन साधना करता है।
यदि पुलिस कर्मी इस रहस्य को समझकर ईश्वर की इच्छा के अनुरूप जीवन जीना प्रारंभ करता है तो उसका स्वधर्म इहलोक और परलोक दोनों के लिए शुभ होगा। भौतिक परिलब्धियों की न तो कोई सीमा है और न ही वे महत्वपूर्ण हैं, इसलिए कर्तव्य पालन और सेवा भाव परम संतुष्टि के मार्ग हैं। इतिहास में केवल त्याग ही स्मरणीय होता है, भोग नहीं।

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