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हरिद्वार में गायत्री परिवार शताब्दी समारोह: राज्यपाल ने कहा- शताब्दी समारोह ने दिया युग परिवर्तन का सशक्त संकेत

Chikheang 3 hour(s) ago views 360
  

शताब्दी समारोह में संबोधित करते हुए राज्यपाल ले. जनरल (सेनि) गुरमीत सिंह। जागरण



जागरण संवाददाता, हरिद्वार। गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की साधना के सौ वर्ष, माता भगवती देवी शर्मा की जन्मशताब्दी तथा अखंड दीप के प्राकट्य के सौ वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित शताब्दी समारोह शनिवार को सम्पन्न हो गया।

शताब्दी समारोह के प्रथम चरण में निकाली गई ज्योति कलश यात्रा बैरागी द्वीप से अपनी मातृसंस्था शांतिकुंज पहुंची। यह ज्योति कलश यात्रा भारत सहित आस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका सहित 20 से अधिक देशों में निकाली गई, जिससे गायत्री परिवार के संदेश को वैश्विक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाया गया।

मातृ समर्पण समापन समारोह के मुख्य अतिथि राज्यपाल ले. जनरल गुरमीत सिंह(सेनि) ने शताब्दी समारोह को युग -परिवर्तन का सशक्त संकेत बताते हुए कहा कि शताब्दी समारोह का यह आयोजन नवयुग के शुभारंभ की घोषणा है।

गायत्री परिवार ने मानवता को जो मूल संदेश दिया है, हम बदलेंगे तो युग बदलेगा। वही आज ब्रह्मांडीय आदेश के रूप में सामने आ रहा है। शांतिकुंज को केवल आश्रम नहीं, बल्कि युगतीर्थ और आध्यात्मिक प्रयोगशाला बताते हुए कहा कि यहां साधना, प्रशिक्षण और सेवा के माध्यम से श्रेष्ठ नागरिक और श्रेष्ठ मानव का निर्माण होता है।

राज्यपाल ने शिवजी के त्रिशूल की उपमा देते हुए विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत को उसके तीन स्वरूप बताया। उन्होंने 51 दिवसीय (वसुधा वंदन समारोह से लेकर समापन तक) इस यात्रा को चेतना-जागरण और नवयुग-जागरण की यात्रा कहा तथा साधकों से आग्रह किया कि वे अपनी सोच, विचार और जीवन-दृष्टि को सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय के भाव से जोड़ने का संकल्प लेकर जाएं।
सच्ची साधना चमत्कार नहीं, परिष्कार का मार्ग है: डा.पण्ड्या

समारोह के दलनायक डा. चिन्मय पण्ड्या ने इस अवसर को सौभाग्य की त्रिवेणी बताते हुए राज्यपाल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की तथा समस्त गायत्री साधकों का आभार जताया।

पण्ड्या ने कहा कि आज आध्यात्मिकता को इंटनेट मीडिया के लाइक्स से आंका जा रहा है, जबकि सच्ची साधना चमत्कार नहीं, परिष्कार का मार्ग है। गुरु अनेक मिल सकते हैं, पर पिता समान गुरु, वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मिलते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रकाश के लिए आंखें खोलनी पड़ती हैं और जिसने भगवान को दिया है, वह कभी खाली हाथ नहीं रहता। अंत में उन्होंने जीवन में ग्रहणशीलता विकसित करने का आह्वान करते हुए साधना और सेवा को सार्थक बनाने का संदेश दिया।

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