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शौक से सुई तक, हरियाणा के पंजाब से लगते जिलों में मेडिकल नशा बन रहा युवाओं की कब्र, गोलियों का घोल इंजेक्शन से शरीर में उतार रहे

LHC0088 2026-1-6 13:56:48 views 779
  

नशे की ओवरडोज से युवाओं की जान जा रही है।



जागरण संवाददाता, फतेहाबाद। पंजाब से लगते हरियाणा के जिलों में नशे का स्वरूप अब केवल अपराध नहीं, बल्कि एक खामोश महामारी बन चुका है। हेरोइन और गांजा जैसे पारंपरिक नशों से शुरू हुई यह कहानी अब मेडिकल नशे की सुई पर आकर थम रही है।

पहले नशीली गोलियां, फिर इंजेक्शन और अंत में गोलियों को घोलकर इंजेक्शन के जरिये शरीर में उतारने का खतरनाक प्रयोग शुरू हो जाता है। इसी दौरान नसें ब्लाॅक होना, इंफेक्शन फैलना और ओवरडोज जैसी स्थितियां पैदा होती हैं।

कई युवाओं की नसें कमजोर हो चुकी हैं, हाथ-पांव गल गए हैं और शरीर स्थायी रूप से अपंग होने की कगार पर है या हो चुके हैं। इतना ही नहीं, नशे की ओवरडोज से युवाओं की जान जा रही है।

अगर फतेहाबाद जिले की ही बात करें तो छह महीनों में जिले में 20 से अधिक युवाओं की मौत नशे की ओवरडोज से हो चुकी है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में नशे के कारण 50 से अधिक लोगों की जान चली गई, जबकि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक माना जा रहा है।

नशे का फैलाव एक तय पैटर्न पर चल रहा है। शुरुआत शौक में हेरोइन से होती है। धीरे-धीरे यही शौक लत में बदल जाता है। हेरोइन महंगी होने के कारण नशे का आदी युवा अपने खर्च की पूर्ति के लिए अन्य युवाओं को नशे से जोड़ता है और उनसे सप्लाई करवाने लगता है। जैसे-जैसे लत बढ़ती है और खर्च काबू से बाहर होता है, वैसे-वैसे युवक सस्ते विकल्प की ओर मुड़ता है। यहीं से मेडिकल नशे की एंट्री होती है।

2021 में केंद्र सरकार की सूची में आया जिला

वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने फतेहाबाद को अधिक नशाग्रस्त जिलों की सूची में शामिल किया था। इसके बाद पुलिस और प्रशासन ने हेरोइन व गांजा तस्करी के खिलाफ सख्त अभियान चलाया, जिससे बाहरी नशे की आपूर्ति पर काफी हद तक अंकुश लगा।  इसी खाली जगह को मेडिकल नशे ने भर दिया। मेडिकल स्टोरों से आसानी से मिलने वाली नशीली गोलियां अब युवाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी हैं।
3220 लोग नशा छोड़ने के लिए नशा मुक्ति केंद्र पहुंचे

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार फतेहाबाद जिले में वर्ष 2025 में 3220 लोग नशा छोड़ने के लिए नशा मुक्ति केंद्र पहुंचे, लेकिन संसाधनों की कमी के चलते केवल 240 को ही भर्ती किया जा सका। रतिया और टोहाना जैसे बड़े उपमंडलों में नशा मुक्ति केंद्र न होना हालात को और गंभीर बना रहा है। यहां नशेड़ियों को केवल ओपीडी के माध्यम से दवाइयां दी जा रही हैं, जिससे संपूर्ण इलाज संभव नहीं हो पा रहा। टोहाना में एटीएफ की घोषणा तो हुई, लेकिन अब तक डाक्टरों की तैनाती नहीं हो सकी।


  


नशे के खिलाफ हमारी लड़ाई केवल तस्करों तक सीमित नहीं है, नशे के आदी युवाओं को चिन्हित कर उन्हें इलाज, काउंसिलिंग और दवा दिलाई जा रही है, पुलिस रोजाना फोन कर फीडबैक लेती है, अभिभावकों से संपर्क में रहकर युवाओं की मानिटरिंग की जा रही है।-सिद्धांत जैन, एसपी, फतेहाबाद।
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