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यूपी कृषि विभाग का नया नियम, मशीन पर अंगूठा लगाते ही पकड़े जाएंगे ज्यादा खाद लेने वाले किसान

deltin33 2025-12-5 22:10:21 views 392
  



जागरण संवाददाता, गाजीपुर। खाद की कमी, कालाबाजारी और अनियमित वितरण से परेशान किसानों को जल्द ही राहत मिलने वाली है। कृषि विभाग ने खाद वितरण को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए एल-1 पीओएस मशीन का नया वर्जन 3.3.1 लागू कर दिया है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

इस वर्जन में सबसे बड़ी सुविधा यह है कि किसान अंगूठा लगाते ही मशीन पर उसकी जोत और पूरे वर्ष में ली गई खाद का पूरा रिकार्ड दिख जाएगा। यदि किसी किसान ने अपनी जोत से अधिक खाद ली है, तो वह तुरंत पकड़ में आ जाएगा। इससे न सिर्फ कालाबाजारी रुकेगी बल्कि किसानों को उनकी जरूरत के अनुसार सही मात्रा में खाद आसानी से मिल सकेगी।

नए सिस्टम का संचालन टीएमएस सर्वर से होगा और इसमें जियो-फेंसिंग की सुविधा भी जोड़ दी गई है। यानी पीओएस मशीन अब सिर्फ उसी दुकान से चलेगी, जिसके लिए उसे पंजीकृत किया गया है। मशीन आन करते ही विक्रय केंद्र का अक्षांश और देशांतर (लोकेशन) स्वतः दर्ज हो जाएगा।

इससे उर्वरक की अवैध ढुलाई और मोबाइल मशीन चलाकर गड़बड़ी करने पर पूरी तरह रोक लगेगी। जिला कृषि अधिकारी उमेश कुमार ने सभी थोक व फुटकर विक्रेताओं को निर्देश दिया है कि वे खाद की बिक्री इसी अपडेटेड वर्जन से करें।

नए वर्जन में खाद बेचने का समय भी आटोमैटिक सेट है। रात आठ बजे के बाद खाद बेचने पर कार्रवाई होगी। इससे देर रात गुपचुप की जाने वाली अवैध बिक्री बंद होगी।  

पर्याप्त है जनपद में स्टाक

किसानों को उनकी जरूरत के अनुरूप सही खाद उपलब्ध कराने के लिए जिले में खाद का स्टाक भी पर्याप्त है। नंदगंज रैक प्वाइंट पर हाल ही में 2450 मीट्रिक टन यूरिया पहुंचा है, जिसमें से 1000 मीट्रिक टन सहकारी समितियों को और शेष निजी बिक्री केंद्रों पर भेजा गया है। जिले में कुल 26,610 मीट्रिक टन यूरिया, 8,821 मीट्रिक टन डीएपी, 7,203 मीट्रिक टन एनपीके, 3,348 मीट्रिक टन एसएसपी और 440 मीट्रिक टन पोटाश उपलब्ध है। आपूर्ति भी नियमित रूप से जारी है।  

अनावश्यक भंडारण न करें किसान

विभाग ने किसानों से आह्वान किया है कि डीएपी का अनावश्यक भंडारण न करें और सब्जी, केला व अन्य फसलों में टीएसपी, एनपीके, नैनो डीएपी व नैनो यूरिया का उपयोग बढ़ाएं। नैनो डीएपी से बीज उपचार करने पर दानेदार डीएपी की आवश्यकता लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है, जिससे लागत घटती है और उत्पादन भी बेहतर मिलता है।
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