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प्रियंका गांधी ने नई शिक्षा नीति पर उठाया सवाल तो भड़की भाजपा, धर्मेंद्र प्रधान बोले- उनकी टिप्पणियां राजनीतिक से प्रेरित

LHC0088 2025-10-31 04:36:50 views 1279
  

धर्मेंद्र प्रधान ने कहा एनईपी और पीएम-श्री पर प्रियंका गांधी की टिप्पणियां राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित (फाइल फोटो)



जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) व पीएमश्री (प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया) को लेकर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की टिप्पणियों पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तीखा पलटवार करते हुए उसे अज्ञानता और राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों को इनोवेशन, क्रिटिकल थिंकिंग और देश की विरासत पर गर्व के साथ सशक्त बनाना \“विचारधारा\“ है तो हां, यह विचारधारा राष्ट्र निर्माण की है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

  

उन्होंने प्रियंका गांधी की टिप्पणियों को लेकर यह प्रतिक्रिया तब दी, जब उन्होंने केरल के वायनाड में पत्रकारों से चर्चा में एनईपी व पीएमश्री पर गंभीर सवाल उठाए थे और कहा था कि इसके जरिये देश के बच्चों को भाजपा सरकार दिग्भ्रमित कर रही है। वह उन पर अपनी विचारधारा को थोप रही है। बच्चों को इतिहास के गलत तथ्य पढ़ाए जा रहे हैं। हम इसके खिलाफ हैं और विरोध करते हैं।  

  

उन्होंने कहा कि प्रियंका गांधी जिस तरह से भ्रामक और गैर जिम्मेदाराना बयान दे रही हैं, वह न सिर्फ तथ्यों को तोड़-मरोड़ है, बल्कि देशभर के शिक्षकों, शिक्षाविदों और नागरिकों के सामूहिक ज्ञान का अनादर भी है।  

  

प्रियंका गांधी की इन टिप्पणियों पर नाराजगी जताते हुए कहा कि देश 30 से अधिक वर्षों से ऐसे सार्थक शिक्षा सुधारों की प्रतीक्षा कर रहा था, ताकि युवाओं को 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सके।  

  

इसे वैश्विक ख्याति प्राप्त विज्ञानी प्रो. के कस्तूरीरंगन के मार्गदर्शन में तैयार किया गया है। देश के लाखों शिक्षकों, छात्रों और संस्थानों ने भाग लिया। यह नीति समावेशिता, समानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर जोर देते हुए देश की शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने की दिशा में तेजी बढ़ रही है।

  

उन्होंने कहा कि पीएमश्री स्कूल एनईपी की सोच का एक जीवंत प्रतीक हैं। जहां आदर्श स्कूल, स्मार्ट क्लास रूम, अटल टिंकरिंग, इनोवेशन लैब, डिजिटल व अनुभवात्मक शिक्षा, पुस्तकालय, पर्यावरण अनुकूल परिसर, कौशल केंद्र आदि मौजूद हैं।  

  

इन दूरदर्शी पहलों का विरोध करना न सिर्फ नीति की आलोचना करना है, बल्कि उस भारत के विचार के विरुद्ध खड़ा होना है जिसे अब अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए पुराने राजनीतिक राजवंशों के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।  

  

शायद इस बेचैनी की वजह यही है, क्योंकि इन परिवारों ने दशकों तक शिक्षा को राजनीतिक बयानबाजी और उपेक्षा तक सीमित रखा था। अब जब सुधार वास्तव में लागू हो रहे हैं तो यह कुछ लोगों को पच नहीं रहा है।
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