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फर्जी डिग्री, असली फैसले: पाकिस्तान के हाईकोर्ट जज की LLB डिग्री निकली फर्जी, पांच साल बाद पद से हटाने का आदेश

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पाकिस्तान के हाईकोर्ट जज की LLB डिग्री निकली फर्जी, पांच साल बाद पद से हटाने का आदेश (फोटो- एक्स)



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पाकिस्तान की न्यायपालिका में एक बड़ा घोटाला सामने आया है। इस्लामाबाद हाईकोर्ट (IHC) ने अपने ही पूर्व जज तारिक महमूद जहांगीरी की नियुक्ति को पूरी तरह अमान्य घोषित कर दिया है, क्योंकि उनकी LLB डिग्री फर्जी पाई गई। जहांगीरी दिसंबर 2020 से हाईकोर्ट में जज थे और करीब 5 साल तक (सितंबर 2025 तक सक्रिय रूप से) न्यायिक कार्य करते रहे, जिसमें कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए।

डॉन अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सरदार मुहम्मद सरफराज डोगर और जस्टिस मुहम्मद आजम खान की दो सदस्यीय पीठ ने सोमवार (23 फरवरी 2026) को 116 पृष्ठों का विस्तृत फैसला जारी किया। फैसले में कहा गया कि जहांगीरी की नियुक्ति “कानूनी अधिकार के बिना“ थी और यह “कानूनी रूप से शून्य“ है। उनकी मूल एलएलबी डिग्री “शुरुआत से ही अमान्य“ घोषित की गई।
फर्जी डिग्री का पूरा खेल

  • कराची यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार द्वारा पेश मूल अभिलेखों के आधार पर अदालत ने पाया कि जहांगीरी ने 1988 में एलएलबी पार्ट-1 परीक्षा फर्जी नामांकन संख्या से दी।
  • नकल करते पकड़े जाने पर यूनिवर्सिटी ने 1989 में उन्हें 3 साल के लिए परीक्षा से प्रतिबंधित कर दिया।


सजा से बचने के लिए उन्होंने अगले साल “इम्तियाज अहमद“ नाम के एक अन्य छात्र की नामांकन संख्या चुराकर “तारिक जहांगीरी“ के नाम से परीक्षा दी और डिग्री हासिल की। गवर्नमेंट इस्लामिया लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल ने अदालत को बताया कि जहांगीरी को कभी संस्थान में प्रवेश ही नहीं मिला था।

अदालत ने कहा कि जहांगीरी को कई बार मूल दस्तावेज और लिखित जवाब पेश करने का मौका दिया गया, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके। इसके बजाय उन्होंने विलंबकारी रणनीतियां अपनाईं – जैसे मुख्य न्यायाधीश से अलग होने की मांग, पूर्ण पीठ की मांग और अनिश्चितकालीन स्थगन। पीठ ने इन्हें “बेंच-हंटिंग“ और “विलंबकारी रणनीति“ करार दिया।
कैसे 5 साल तक छिपा रहा मामला?

जहांगीरी की नियुक्ति दिसंबर 2020 में हुई थी। जुलाई 2024 में सोशल मीडिया पर कराची यूनिवर्सिटी का एक पत्र वायरल हुआ, जिसके बाद सुप्रीम जुडिशियल काउंसिल में शिकायत दर्ज हुई। इस्लामाबाद हाईकोर्ट में भी याचिका दायर हुई।

सितंबर 2025 में उन्हें न्यायिक कार्यों से रोक दिया गया था। दिसंबर 2025 में इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने उनकी डिनोटिफिकेशन का आदेश दिया, और अब फरवरी 2026 में विस्तृत फैसला आया, जिसमें उनकी पूरी नियुक्ति को रद्द कर दिया गया।

यह मामला पाकिस्तान की न्यायपालिका की जांच प्रक्रिया, नियुक्ति में सत्यापन और फर्जी डिग्री घोटालों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह “मुन्ना भाई MBBS“ स्टाइल का घोटाला है, जहां एक व्यक्ति फर्जी योग्यता के सहारे सालों तक उच्च पद पर रहा।   
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