राधा-कृष्ण के प्रेम और स्त्री शक्ति का अनूठा उत्सव है लठामार होली (Picture Credit- AI Generated)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बरसाना की लठामार होली (जिसे लठमार और लट्ठमार की संज्ञा से भी जाना जाता है) उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में मनाई जाने वाली पारंपरिक होली है, जो राधा रानी और भगवान कृष्ण के प्रेम और उनकी लीलाओं पर आधारित है।
होरी खेले तो आ जइयो,
बरसाने रसिया
रंग भी लइयो गुलाल भी लइयो,
गोपी भी लइयो संग ग्वाल भी लइयो,
मन मिले तो आ जइयो,
बरसाने रसिया
फाल्गुन मास में बरसाना की रंगीली गली में होने वाले इस उत्सव में नंदगांव के पुरुष (हुरियारे) बरसाना की महिलाओं (हुरियारिनों) पर रंग डालते हैं और बदले में महिलाएं उन्हें हंसी-मजाक में लाठियों (लठा) से पीटती हैं, जिससे पुरुष अपनी ढाल से बचते हैं। बरसाना की लठामार होली की परंपरा अद्भुत है। वह बृज में कहते हैं न-
या होरी को का कोऊ जाने
होरी को रस रसिक ही जाने
मन में सदा के लिए अंकित
बरसाना की लठामार होली को जिसने अपनी आंखों से नहीं देखा वह इसके महत्व को, लालित्य को कभी समझ नहीं सकेगा। लठामार होली देखने का मुझे दो बार सौभाग्य मिला है, और प्रेम उमंग से खेली उस होली के अद्भुत चित्र मेरे मन में सदा के लिए अंकित हो गए हैं। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे साक्षात् कन्हैया राधा और गोप ग्वाल बृज बालाओं के साथ फागुनी भक्ति का आध्यात्मिक रंग बरसा रहे हैं।
कब से शुरू होगी लठामार होली
इस वर्ष 26 फरवरी को बरसाना की नारियां नंद गांव के होरियारों के साथ लठामार होली खेलेंगी, यानी ‘होरी’ गाते हुए उन पर प्रेम से लाठियां बरसाएंगी। बरसाने की इस अद्भुत परंपरा को समझने के लिए राधा रानी को हृदय में उतारना होगा। बरसाना में राधा रानी ‘लाड़ली जी’ का सर्वोच्च महत्व है, क्योंकि यह उनका जन्मस्थान और क्रीड़ा स्थली माना जाता है।
यहां ब्रह्मगिरि पर्वत पर स्थित ऐतिहासिक लाड़ली जी मंदिर और लठामार होली के माध्यम से राधा-कृष्ण के निस्वार्थ प्रेम, भक्ति और स्त्री शक्ति को पूजा जाता है। बृज भूमि राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम का केंद्र है। यहां कान्हा की नहीं, श्री राधारानी की आध्यात्मिक सत्ता है। बरसाना राधा रानी की जन्मस्थली है, और थोड़ी ही दूर है वह नंदगांव जहां का भक्तिमय वातावरण आज भी कान्हा की उपस्थिति दर्शाता है।
फागुन में भीगती प्रेम की डोर
बरसाना की लठामार होली विश्वप्रसिद्ध है। बरसाना और नंदगांव के बीच प्रेम में सराबोर ऐसी डोर है जो हर फागुन में रसरंग में भीजती है, अपने भक्तों को उसी प्रेम में भिगोती है। शिवरात्रि के दिन से ही लाडली जी महल से ढप, मृदंग और झांझ की थाप पर ब्रजवासी भक्ति और प्रेम में डूबे हुए नाचते-गाते होली की गुहार लगाने लगते हैं। बरसाने की रंगीली गली में होरी के पदों की गूंज के साथ ही अबीर गुलाल उड़ना आरंभ हो जाता है।
होरी है भई होरी है,होरी है भई होरी है
लठामार बरसाना खेलूं राधा रानी से मैं बोलूं
लाया हूं नंद का लाल रसिया होरी में,
सुनले ओ नंद के लाल रसिया होरी में,
लाल गुलाल लगा दूं तोपे, फिर मैं बोलूं सीधे मुंह से
मैं तो मारूं पिचकारी धार रसिया होरी में
नारी बनाई नचाई छोड़िहों
एक दिन पहले होती है लड्डू होली
बरसाने का होली खेलने का न्योता जब नंदगांव में स्वीकार हो जाता है, तो उस प्रसन्नता में लड्डू उड़ाये जाते हैं...कितनी सुंदर परंपरा है और कितनी सुंदरता से आज तक निभाई जा रही है। एक दिन लठामार होली बरसाने में होती है और अगले दिन नंदगांव में और तब हुरियार गा उठते हैं-
रसिया को नार बनाओ री रसिया को
बेंदी भाल नयन बिच काजर
नक बेसर पहिराओ री रसिया को
हास-परिहास, प्रेम-अनुराग का दूसरा ऐसा उदाहरण कहीं ढूंढे से भी नहीं दिखता। लाठी बरसाती बरसाना की स्त्रियां स्त्री सशक्तिकरण की प्रतीक है, इसके केंद्र में राधा की शक्ति जो है। शास्त्र राधा रानी को लक्ष्मी का अवतार, कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति और सर्वोच्च देवी मानते हैं। बरसाना में राधा के रूप में नारी शक्ति और प्रेम को कृष्ण से भी ऊपर स्थान दिया गया है। बृज में राधे राधे का अभिवादन राधा रानी के दैवीय प्रेम का नित्य पुण्य सुमिरन है।
आइए इस बार होली में राधा और कृष्ण के प्रेम को आत्मसात करते हुए सहज भाव से सबसे मिल कर खेलें, वैसे ही जैसे बृजनंदन राधा रानी के साथ गोप ग्वाल संग मिल रंग ही नहीं सुख बरसाते थे!
होली खेलने का विशेष आमंत्रण
सबसे कमाल तो यह है कि नंदगांव के पुरुषों को बरसाना की महिलाओं द्वारा खास तौर पर होली खेलने के लिए न्योता भेजा जाता है। टेसू और पलाश के फूलों से बने रंगों से होली खेलने की तैयारी की जाती है। यहां तक कहा जाता है कि फागुन चढ़ते ही नंदगांव से होरियारों की ओर से बरसाना की होरियारिनों के लिए देसी घी भेजा जाता है जिससे वे ताकत से उन पर लाठी बरसा सकें।
इस दौरान श्री राधा और कृष्ण की प्रेम वार्ता पर आधारित पारंपरिक लोक गीत और रसिया गाए जाते हैं। ब्रज की हर स्त्री उमंग और उल्लास में राधारानी हो जाती है और पुरुष कान्हा। बरसाना की महिलाएं हुरियारों को लाठी से मारती हैं, जबकि पुरुष खुद को बचाने की कोशिश करते हैं। यदि कोई पुरुष पकड़ा जाता है, तो उसे रसिया गाते हुए महिलाओं के कपड़े पहनाकर नृत्य कराया जाता है।
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